आखिर हार के बाद क्यों चीखते चिल्लाते हैं कांग्रेस के नेता, चापलूसों के आगे नहीं गलती है दाल

18 Nov, 2020 12:31 IST|सुषमाश्री
सोनिया गांधी और राहुल गांधी

राहुल के पॉलिटिकल करियर के लिए प्रियंका खतरा

पार्टी की कमान गांधी परिवार के बाहर सौंपी जाए

पार्टी में अध्यक्ष पद के लिए कोई भी नहीं फिट

नई दिल्ली: पिछले दिनों बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम 2020 (Bihar Assembly Election Result 2020) आने के बाद कांग्रेस (Congress) पार्टी में हार को लेकर मंथन के बजाय एक बार फिर से पार्टी नेताओं के बीच रस्साकशी शुरू हो चुकी है। हमेशा की तरह इस बार भी पार्टी हार को लेकर न तो मंथन कर रही है और न ही आगे से ऐसा न हो, इसके लिए कोई ठोस रणनीति ही बनाने में जुटी है। पार्टी में अगर कुछ चल रहा है तो बस चीखना, चिल्लाना।

हार के बाद हमेशा की तरह एक धड़ा पार्टी नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े कर रहा है तो दूसरा इन सवालों के विरोध में और गांधी परिवार के पक्ष में आवाज उठा रहा है। यानी ढाक के वही तीन पात। कुछ लोग नेतृत्व को लेकर सवाल उठा रहे हैं तो कुछ अन्य गांधी परिवार के खिलाफ उठ रहे स्वर के ​विरोध में अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर हर हार के बाद कांग्रेस में चीखना चिल्लाना क्यों शुरू हो जाता है?

पार्टी में क्यों शुरू हो जाती है चापलूसी?

इतना ही नहीं, इसके बाद गांधी परिवार के चापलूस नेताओं की चापलूसी क्यों शुरू हो जाती है, क्या इसके पीछे गांधी परिवार की महत्वाकांक्षा है या फिर कुछ और? बीते दिनों कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल (Kapil Sibbal) की ओर से एक इंटरव्यू के दौरान कांग्रेस नेतृत्व पर उठाए गए सवालों ने पार्टी में अंदरखाने एक बार फिर से तनाव का माहौल बना दिया है।

बता दें कि पिछले दिनों कपिल सिब्बल ने कांग्रेस की सियासी दशा सुधारने को लेकर पार्टी नेतृत्व की उदासीनता को लेकर सवाल खड़े किए थे। उनका यह बयान तब सामने आया जब एक बार फिर पार्टी अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी का नाम सामने आने लगा था। सूत्रों के हवाले से खबर यह भी थी कि बहुत जल्द पार्टी आलाकमान एक बैठक करके इस पर फैसला भी कर सकते हैं।

सिब्बल के बयान के बाद उठे विरोध के स्वर

गौरतलब है कि बिहार विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस में एक बार फिर विरोध के स्वर उठने लगे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठाए जाने के बाद बहस फिर तेज हो गई है। पर इस बार असंतुष्ट स्वर बहुत प्रभावी नहीं हैं। क्योंकि, पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखने वाले बाकी वरिष्ठ असंतुष्ट नेता चुप हैं। इससे पार्टी को जरूर कुछ राहत मिली है।

कांग्रेस नेता मानते हैं कि पार्टी में अंसतुष्ट गुट की नाराजगी अभी भी बरकरार है। ऐसे में इसका सीधा असर पार्टी अध्यक्ष पद के लिए होने वाले चुनाव पर पड़ेगा। अध्यक्ष पद के लिए दिसंबर के आखिर में चुनाव होने की संभावना है। पार्टी के एक नेता ने कहा कि अगर राहुल गांधी वापसी की तैयारी कर रहे हैं, तो असंतुष्ट नेताओं के स्वर कुछ धीमे जरूर हो सकते हैं, पर आवाज उठती रहेंगी।

प्रियंका गांधी को इसलिए नहीं मिल रही कुर्सी

कांग्रेस पार्टी पर करीबी नजर रखने वाले पत्रकारों के मुताबिक बेशक 2019 लोकसभा चुनावों के बाद कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन आज भी पार्टी को उनका बेसब्री से इंतजार है। इसके पीछे कई वजहें हैं। इतने दिनों में यह साफ हो चुका है कि प्रियंका गांधी कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष पद की कुर्सी पर नहीं बैठना चाहतीं। इसके पीछे कई वजहें बताई जा रही हैं।

माना जा रहा है कि अगर एक बार प्रियंका पार्टी अध्यक्ष पद स्वीकार लेती हैं तो सबसे पहले तो राहुल गांधी का राजनीतिक करियर समाप्ति की ओर पहुंच जाएगा। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है प्रियंका का अपनी दादी इंदिरा गांधी की तरह न केवल दिखना बल्कि इंदिरा की ​तरह ही बातचीत और लोगों से इंटरैक्ट करने की क्वालिटी का होना। जिसकी कमी राहुल में साफ तौर पर खलती है। वैसे भी लंबे समय से पार्टी अध्यक्ष के तौर पर प्रियंका का नाम सामने लाने की मांग उठती रही है लेकिन पार्टी ऐसा करने से बचती रही है।

हिंदू वोट पूरी ​तरह से दूर होने का खतरा

इसके अलावा एक वजह प्रियंका की शादी क्रिश्चियन रॉबर्ट वाड्रा के साथ होना भी है। बता दें कि प्रियंका की शादी क्रिश्चियन रीति रिवाज से हुई थी और शादी के बाद उन्होंने क्रिश्चियन धर्म अपना लिया था। आज जब​ ज्यादातर हिंदू वोट खिसककर बीजेपी की ओर जा चुका है, तब किश्चियन धर्म अपना चुकी प्रियंका का कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बन जाना इसे पूरी तरह से हिंदुओं से अलग कर सकता है। इससे पार्टी को बड़ा झटका लग सकता है।

यहां प्रियंका को पार्टी अध्यक्ष न बनाने के पीछे एक और तर्क यह दिया जा रहा है कि ऐसा करते ही पार्टी में गुटबाजी का खतरा बढ़ जाएगा। ​एक गुट राहुल का और दूसरा धड़ा प्रियंका का हो सकता है। इससे पार्टी में टूट का खतरा बढ़ने का खतरा है।

राहुल के पॉलिटिकल करियर के लिए प्रियंका खतरा

साथ ​ही राहुल में तुलनात्मक रूप से प्रियंका के मुकाबले कम प्रतिभा होने की वजह से राहुल का राजनीतिक करियर ढलान पर पहुंचने की उम्मीद है। इससे एक और खतरा यह पैदा हो सकता है​ कि कांग्रेस पार्टी से गांधी का नाम अलग हो जाएगा। पार्टी वाड्रा के नाम से जानी जाने लगेगी। और इसका नुकसान भी पार्टी को भुगतना पड़ेगा।

अब बात करें कि पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी परिवार के बाहर किसी जिम्मेदार को क्यों न सौंपी जाए? इस पर भी राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस के लिए यह निर्णय ले पाना भी टेढ़ी खीर साबित हो सकती है। पार्टी में कई वरिष्ठ मौजूद हैं लेकिन उनमें से अब कोई भी ऐसा नहीं है जिसका नाम पार्टी अध्यक्ष के तौर पर आगे किया जा सके।

पार्टी में अध्यक्ष पद के लिए कोई भी नहीं फिट

कपिल सिब्बल तो पहले ही अपने बयानों की वजह से विवादों में घिरे रहते हैं। उनके अलावा गुलाम नबी आजाद, पी. चिदंबरम, सलमान खुर्शीद, राजीव शुक्ला, आनंद शर्मा, मुकुल वाश्निक, सीपी जोशी, अजय माकन, मनीष तिवारी... जैसे कई ऐसे नाम हैं जिन्हें पार्टी अध्यक्ष बनाने के ​बारे में सोचना पार्टी के हित में कम और अहित में ज्यादा नजर आता है। इनमें से एक नाम भी ऐसा नहीं है जिस पर पूरी पार्टी एकमत हो सकती है जिससे कि पार्टी का काम काज बाधित न हो।

इसके अलावा एक और समस्या पार्टी में यह उभरकर सामने आ जाती है कि अगर ऐसा किया जाता है तो पार्टी को एकजुट रख पाना कांग्रेस पार्टी या गांधी परिवार के लिए मुश्किल हो सकता है। उस पर पार्टी गांधी परिवार के हाथ से बाहर भी हो जाएगी। इन हालातों में पार्टी के पास एकमात्र विकल्प गांधी परिवार ही रह जाता है।​ फिर परिवार में भी राहुल पार्टी की मजबूरी बन जाते हैं।

खुलकर सामने आ रहे हैं चापलूस नेता

शायद ये ही वजहें हैं, जिन्होंने सिब्बल के मुंह से भी कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व को लेकर सवाल करवा दिए। हालांकि सिब्बल के सवालों पर लगाम लगाने के लिए अब कांग्रेस हाईकमान के समर्थक नेता या कहें कि चापलूस खुलकर सामने आ गए हैं। इन नेताओं ने जवाबी हमला करते हुए सिब्बल को घेरे में ले​ लिया है। साथ ही, गांधी परिवार के नेतृत्व के प्रति अपने मजबूत समर्थन का इजहार किया।

लोकसभा में पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी, सलमान खुर्शीद, राजीव शुक्ला समेत कई युवा ब्रिगेड सांसद मणिक्कम टैगोर ने सिब्बल पर निशाना साधते हुए हाईकमान का बचाव किया। दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी में तैयार हो रहे इस गंभीर दौर के बीच कांग्रेस अध्यक्ष की मदद के लिए बनी छह सदस्यीय सलाहकार समिति की मंगलवार को एक अहम बैठक भी की गई।

सोनिया ने बनाई थी एक ​कमिटी

बैठक में बिहार चुनाव की हार की बजाय कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के समर्थन में चलाए जा रहे आंदोलन की आगे की रूपरेखा पर विचार विमर्श किया गया। गौरतलब है कि  बीते अगस्त में 23 नेताओं की ओर से लिखे गए पत्र विवाद के बाद कांग्रेस में नेतृत्व शैली और संगठन की चाल-ढाल की कमजोरी को लेकर सोनिया गांधी ने इस समिति का गठन किया था। पार्टी सूत्रों ने कहा कि सिब्बल का ताजा बयान चर्चा के दायरे में नहीं था।

कांग्रेस पार्टी आधिकारिक तौर पर सिब्बल के उठाए सवालों पर बोलने से परहेज कर रही है मगर पार्टी नेता अब एक-एक कर हाईकमान के मुखर समर्थन में उतरने लगे हैं। अधीर रंजन चौधरी ने तो सीधे सिब्बल को आईना दिखाते हुए कहा कि अगर पार्टी को लेकर उनकी चिंता इतनी ही गहरी है तो उन्होंने खुद इस दिशा में क्या जिम्मेदारी निभाई है?

पार्टी की कमान गांधी परिवार के बाहर सौंपी जाए

साल 2019 चुनाव के बाद राहुल गांधी ने इस्तीफा दे दिया और गांधी परिवार से बाहर के व्यक्ति को पार्टी की कमान सौंपने की पेशकश की। अधीर ने निशाना साधते हुए कहा कि सोनिया और राहुल गांधी के इरादों पर सवाल नहीं उठाया जा सकता और एसी कमरे में बैठकर उपदेश देने की बजाय सिब्बल को मैदान में उतरकर काम करना चाहिए।

इसी तरह सलमान खुर्शीद ने सिब्बल का नाम लिए बिना फेसबुक पर अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर की पंक्तियों के सहारे हाईकमान पर निशाना साधने वालों को अपने गिरेबां में झांकने की नसीहत दी। उन्होंने कहा कि यदि मतदाता कांग्रेस के उदारवादी मूल्यों को अहमियत नहीं दे रहे तो सत्ता का शार्ट कट रास्ता खोजने की जगह हमें लंबे संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए। वैसे सिब्बल के उठाए सवालों से पार्टी सांसद विवेक तन्खा और कीर्ति चिदंबरम ने सहमति जताई थी।

राहुल ने अन्याय के खिलाफ उठाई आवाज

इसी तरह पार्टी नेता राजीव शुक्ल ने गांधी परिवार के समर्थन में उतरते हुए कहा कि राहुल गांधी ने हमेशा आमलोगों की लड़ाई लड़ी है और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई है। इतना ही नहीं वे विपक्ष की एकलौती निडर आवाज भी हैं। राजस्थान के मुख्यमंत्री पार्टी दिग्गज अशोक गहलोत ने तो पहले ही दिन सिब्बल के सवालों को खारिज कर दिया था। पर यह भी ध्यान देने योग्य है कि सिब्बल की आलोचना और हाईकमान के बचाव में उतरे नेताओं में उन वरिष्ठ नेताओं में से कोई नहीं है, जो पहले कार्यशैली पर आवाज उठा चुके हैं। जाहिर है कि कांग्रेस में शुरू हुए खटपट के इस दौर के जल्द थमने के आसार नहीं हैं।

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