किसानों का भारत बंद: कृषि विधेयकों के खिलाफ जोरदार आंदोलन जारी, पटरियों पर लेटे अन्नदाता

25 Sep, 2020 07:37 IST|Sakshi
किसानों का आंदोलन

किसानों का देशव्यापी चक्का जाम आज

पंजाब में तीन दिनों तक रेल सेवा ठप

कृषि बिलों के खिलाफ किसानों का आंदोलन

नई दिल्ली: संसद में पास हुए खेती से जुड़े बिलों को लेकर सियासत चरम पर है। विपक्ष पूरे देशभर के किसानों को केंद्र सरकार के खिलाफ गोलबंद करने में जुटा हुआ है। इसी सिलसिले में किसानों ने आज भारत बंद का आह्वान किया है। इस दौरान सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक चक्का जाम कनरे का कार्यक्रम है। रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब में सबसे अधिक किसानों का विरोध देखने को मिल रहा है। यहां किसानों ने रेलवे पटरियों पर कब्जा जमा लिया है और वहीं लेट गए हैं। इसके अलावा बिहार में राजद के नेतृत्व में किसानों ने जमकर विरोध किया। दक्षिण भारत के राज्यों सहित देश के कई हिस्सों से किसान आंदोलन से जुड़ी खबरें मिल रही है। 

पीएम मोदी ने विपक्ष पर लगाई तोहमत

इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरोप लगाया कि विपक्षी पार्टयां किसानों को बरगला रही है। पीएम मोदी ने बीजेपी कार्यकर्ताओं से किसानों को समझाने की मांग की। प्रधानमंत्री ने भरोसा दिलाया कि किसान बिल पूरी तरह अन्नदाता के हितों को ध्यान में रखकर ही तेैयार किया गया है। 

पंजाब और हरियाणा में रेल सेवा 3 दिनों के लिए ठप

किसानों का पंजाब और हरियाणा में किसान बिलों को लेकर आक्रोश अधिक देखने को मिल रहा है। किसानों के इस विरोध में मजदूर संगठनों और विपक्षी दलों का भी पूरा साथ है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी किसानों को पूर्ण समर्थन दे रही है। 

पंजाब में किसानों ने तीन दिनों तक जगह जगह रेल ट्रैक पर बैठने का फैसला लिया है। पंजाब में तो किसानों ने धमकी दी है कि उनकी बातें नहीं मानी जाती है तो 1 अक्टूबर से अनिश्चितकाल के लिए रेल यातायात ठप किया जाएगा। रेल मंत्रालय ने किसानों की धमकी को गंभीरता से लिया है व पंजाब से गुजरने वाली ट्रेनों को डाइवर्ट किया गया है। 

किसानों का कहना है कि जो नए बदलाव कानून में किए गए हैं। उससे उनकी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद की पुरानी परंपरा समाप्त होगी। साथ ही किसानों को कारोबारियों के बंधुआ की तरह काम करना होगा। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के बारे में किसानों को लगता है कि ये कानून पूंजीपतियों के पूरी तरह हक में है। 

बिहार में सीएम नीतीश ने कृषि बिल का किया समर्थन 

देश के अधिकांश विपक्षी पार्टियों के विरोध के बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यहां गुरुवार को कहा कि कृषि बिल किसानों के हक में है। उन्होंने कहा कि वे विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों से वे फीडबैक लेते रहते हैं। नीतीश गुरुवार को जदयू कार्यालय से निकलते हुए पत्रकारों से बातचीत में कहा कि कृषि बिल किसानों के हक में है।

उन्होंने पत्रकारों के एक प्रश्न के उत्तर में कहा, "हमने वर्ष 2006 में ही प्राथमिक कृषि साख समितियां (पैक्स) के द्वारा प्रोक्योरमेंट शुरू किया और पैक्स को हमलोगों ने विकसित किया, इसलिए बिहार की स्थिति दूसरी है।" उन्होंने आगे कहा कि पैक्स का चुनाव जिस तरह किया गया और पैक्स द्वारा जिस तरह अधिकतम अधिप्राप्ति होती है, यह सभी आप जानते हैं। पहले यह कहां होता था।

उन्होंने सवालिया लहजे में कहा, "यहां अनाज की खरीद का काम कहां होता था? यहां जो काम पहले हुआ है, उसी रास्ते पर देश बढ़ चला है। इसके बारे में अनावश्यक गलतफहमी पैदा की जा रही है। ये बिल किसानों के हक में है।" इधर, बिहार में राजद सहित कई विपक्षी पार्टियों ने शुक्रवार को कृषि बिल को किसान के लिए काला कानून बताते हुए बिहार बंद की घोषणा की है।

दिग्विजय सिंह ने किसानों के विरोध को दी हवा

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने बृहस्पतिवार को कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने किसानों के लिये ‘न्यूतनम समर्थन मूल्य' (एमएसपी) पेश किया था, लेकिन केंद्र की राजग (एनडीए) सरकार विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के दबाव में आकर इसे कमजोर कर रही है। हाल ही में संसद में पारित कृषि और श्रम विधेयकों के खिलाफ विपक्षी कांग्रेस के राष्ट्रव्यापी विरोध-प्रदर्शन के तहत यहां संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने केंद्र पर ये आरोप लगाये। 

एमएसपी है लाल बहादुर शास्त्री की देन 

दिग्विजय सिंह ने कहा कि वह लाल बहादुर शास्त्री थे जिन्होंने कृषकों के लिये न्याय सुनिश्चित करने के वास्ते किसानों के हित को ध्यान में रखते हुए एमएसपी की व्यवस्था पेश की थी। उन्होंने एमएसपी तय करने के लिये लागत एवं मूल्य आयोग का गठन किया था। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘लेकिन मौजूदा भाजपा सरकार अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर इसे कमजोर करने की कोशिश कर रही है। '' उन्होंने कहा कि डब्ल्यूटीओ के दबाव में आकर कृषि विधेयकों के जरिये बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत के कृषि बाजार में प्रवेश करने की अनुमति देने की कोशिश की जा रही है। सिंह ने कहा कि (विधेयकों के जरिये) इन कंपनियों को देशभर में किसानों की उपज खरीदने के लिये अपनी मंडी खोलने की अनुमति दी जाएगी। 

कांग्रेस नेता ने कहा कि किसानों का शोषण होगा क्योंकि उपज की खरीद में शामिल कंपिनयों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं रहेगा। उन्होंने केंद्र की भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (सरकार) को ‘‘किसान-विरोधी'' बताया। उन्होंने दावा किया कि विधेयकों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि शोषित किसान अदालत का दरवाजा खटखटा सके। किसानों को पहले सब-कलेक्टर (उप जिलाधिकारी) के पास शिकायत दर्ज करानी होगी और उसके बाद जिलाधिकारी के पास शिकायत देनी होगी। यदि किसानों को जिलाधिकारी से भी न्याय नहीं मिला तो उसे केंद्र सरकार के पास गुहार लगाने जाना होगा। 

दिग्विजय सिंह ने कहा, ‘‘कृषि राज्य सूची का विषय है लेकिन नये विधेयकों में ऐसे प्रावधान हैं जहां केंद्र हस्तक्षेप करेगा। एपीएमसी (कृषि उत्पाद विपणन समिति) को केंद्र सरकार द्वारा विनियमित किया जाएगा। '' आवश्यक वस्तुओं के मुद्दे का जिक्र करते हुए सिंह ने कहा कि नये विधान के मुताबिक राज्य उन व्यापारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकेंगे, जो वस्तुओं की जमाखोरी करेंगे क्योंकि भंडार की कोई ऊपरी सीमा नहीं रखी गई है। कांग्रेस नेता ने कहा कि अप्रत्यक्ष रूप से नया विधान ‘‘कालाबाजारी को बढ़ावा'' देगा और ‘‘जमाखोरों की मदद'' करेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि खेतीहरों और श्रमिकों को उनके अधिकारों से वंचित करने की ‘सुनियोजित कोशिश' की जा रही है। नये कृषि विधेयकों के प्रावधान के तहत बड़ी कंपनियां किसानों से अनाज खरीद सकेंगी। 

कांग्रेस नेता ने कहा, ‘‘वहीं दूसरी ओर, हम (कांग्रेस) पर एमएसपी के बारे में किसानों को गुमराह करने का आरोप लगाया जा रहा है। भाजपा सरकार किसानों से कम कीमत पर अनाज खरीदने वालों के लिये सजा का प्रावधान करे। वह (भाजपा) ऐसा नहीं कर रही है, लेकिन कांग्रेस के खिलाफ बेबुनियाद आरोप लगा रही। '' सिंह ने कहा कि 1993 में तत्कालीन वाणिज्य मंत्री प्रणब मुखर्जी ने सीमांत किसानों और कारोबारियों के हित में अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकने से सरासर इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने डब्ल्यूटीओ के मार्फत आने वाले अंतराष्ट्रीय दबाव का प्रतिरोध किया था। उन्होंने कहा, ‘‘हमने यह प्रावधान किया था कि ग्रामीण भारत में किसानों को उनकी भूमि का चार गुना मूल्य मिले, जबकि शहरी इलाकों के लिये मूल्य दोगुना रखा गया था। पांच साल तक उपयोग में नहीं लाये जाने पर जमीन उसके मालिक को लौटाने का भी प्रावधान किया गया था। लेकिन मोदी सरकार सत्ता में आते ही इसे रद्द करने के लिये एक अध्यादेश ले आई। अन्य सभी दलों ने इसका विरोध किया। '' उन्होंने यह भी कहा कि श्रम सुधार विधेयक 300 श्रमिकों से अधिक संख्या वाली कंपनियों को सरकार की अनुमति के बगैर उन्हें निकालने की अनुमति देंगी। जबकि पहले यह सीमा 100 श्रमिकों की थी। उन्होंने लोकसभा में कृषि विधेयकों का समर्थन करने और बाद में राज्यसभा में उसका विरोध करने को लेकर ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि बीजद और भाजपा के बीच एक गुप्त तालमेल है। 
 

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