इंदिरा के आपातकाल ने ले ली थी इस एक्ट्रेस की जान, जेल में होता था अमानवीय व्यवहार

25 Jun, 2020 20:19 IST|Sakshi

नई दिल्ली : 45 साल पहले देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लागू कर दी थी। यह आपात काल 21 महीने तक देश में लागू रहा। देश का नौजवान आज भी देश की उस खौफनाक दौर से अपरिचित है। इसलिए उस दौर को जानना काफी आवश्यक है। दरअसल देश में उस वक्त चल रही इंदिरा नेतृत्व वाली सरकार अपने विरोधी नेताओं को एक एक कर जेल भेज रही थी। यही नहीं यातनाएं भी दी जा रही थी। लोगों को समझ नही आ रहा था कि अब इसके आगे आखिर होगा क्या ? हालात इस कदर बिगड़ चुके थे कि सूचना और संचार जैसे संसाधनों पर बैन लगा दिया गया था। इस आपातकाल में चाहे आम हो या खास, नेता हो या फिल्मकार सभी ने इस दर्द को झेला । 

इनमें एक राष्ट्रीयपुरस्कार से सम्मानित एक्ट्रेस भी शामिल थी। उनका नाम था स्नेहलता जो कि तमिल, तेलुगु और कन्नड़ फिल्मों में काम करती थी। उनका जन्म आंध्र प्रदेश में हुआ था। स्नेहलता लोहिया के विचारों से प्रेरित थी। स्नेहलता ने भी इमरजेंसी का विरोध किया था। फिर क्या था  इस बात का खामियाजा उन्हें भी भुगतना पड़ा। साल 1976 में सरकारी कारिंदो ने उन्हें बेगलुरु जेल भेज दिया। उन पर बड़ौदा डायनामाइट केस में मदद करने का आरोप लगाकर अभियुक्त बना दिया गया। उन्हें इस केस में इसलिए अभियुक्त बनाया गया क्योंकि वे जॉर्ज फर्नांडिस की दोस्त थीं।
 

जेल में स्नेहलता को काफी यातनाएं दी गई गई जिसे सुनकर किसी का भी कलेजा कांप उठे। आलम यह था कि जेल कि जिस चारदीवारी में उन्हें बंद किया गया था उसमें केवल एक ही व्यक्ति रह सकता था। इस चार दिवारी में टॉयलेट के नाम दीवार के एक कोने में एक छेद बना हुआ था। यही नहीं उनके परिवारवालों को भी इस बात की जानकारी नहीं थी कि वे किस जेल में बंद है। काफी दिन बाद उनके परिवारवालों को पता चला कि उन्हें बेगलुरू सेंट्रल जेल में रखा गया है।  उन्हें इतना टॉर्चर किया गया कि जेल में ही उनकी तबियत बिगड़ गई। दरअसल वे अस्थमा की मरीज थी जेल में मिली यातनाओं से उनकी तबियत काफी बिगड़ गई। बाद में  पे रोल पर उन्हें रिहा कर दिया, लेकिन उनकी रिहाई को पांच दिन ही बीते थे कि उनकी दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। बाद में उनको इस मुकदमें से बरी कर दिया गया था।

स्नेहलता के साथ जेल में की गई  अमानवीयता की गवाही मधु दंडते की किताब भी करती है। मधु दंडवते स्नेहलता की बगलवाली बैरक में बंद थे। इस किताब में उन्होंने लिखा है कि उन्हें रात के सन्नाटे में अक्सर स्नेहलता की चीखें सुनाई देती थी। 

स्नेहलता ने जेल में लिखी थी डायरी
जैसे ही एक महिला अंदर आती है, उसे बाकी सभी के सामने नग्न कर लिया जाता है। जब किसी व्यक्ति को सजा सुनाई जाती है, तो उसे पर्याप्त सजा दी जाती है। क्या मानव शरीर को भी अपमानित किया जाना चाहिए? इन विकृत तरीकों के लिए कौन जिम्मेदार है? इन्सान के जीवन का क्या मकसद है? क्या हमारा मकसद जीवन मूल्यों को और बेहतर बनाना नहीं है? इन्सान का उद्देश्य चाहे कुछ भी हो, उसे मानवता को आगे बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए।”

“महिलाओं को पहले बुरी तरह से पीटा जाता था, लेकिन अब इसमें कुछ कमी आई। कम से कम मैंने उनके अंदर के भय को तो दूर कर ही दिया है। मैंने तब तक भूख हड़ताल की, जब तक कैदियों को मिलने वाले खाने की गुणवता में सुधार नहीं हुआ।”

VinayTiwari

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