बिहार में ओवैसी की एंट्री से बदलेंगे चुनावी समीकरण, जानिए किसको होगा फायदा और किसे होगा नुकसान

22 Sep, 2020 16:48 IST|मो. जहांगीर आलम
फोटो : सौ. सोशल मीडिया

देवेंद्र यादव की पार्टी से ओवैसी का गठबंधन 

ये पार्टियां ओवैसी के साथ जाने से बचेंगी 

भाजपा और विपक्ष से बना रखी है समान दूरी

बिहार विधानसभा चुनाव के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां कमर कस चुकी है। सभी दल मतदाताओं को साधने की कोशिश में जुट गए हैं। अपने वोट बैंक में विस्तार के लिए नए गठबंधन भी बन रहे हैं। इसी बीच असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) की भी एंट्री बिहार चुनाव में हो गई है। 

देवेंद्र यादव की पार्टी से ओवैसी का गठबंधन 

बिहार में एआईएमआईएम और पूर्व सांसद देवेंद्र यादव की पार्टी समाजवादी जनता दल (डेमोक्रेटिक) ने मिलकर संयुक्त जनतांत्रिक सेकुलर गठबंधन (यूडीएसए) बना लिया है। इस गठबंधन के बनने के बाद बिहार विधानसभा चुनाव में तीसरे मोर्चें की संभावना भी दिखने लगी है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि कोई अन्य दल इस गठबंधन में आ रहा है, या नहीं। लेकिन इस बात की चर्चा शुरू हो गई है कि आखिर बिहार में ओवैसी की एंट्री से किसके वोट बैंक पर असर पड़ने वाला है? 

सीमांचल क्षेत्र में राजद को नुकसान  

बिहार चुनाव पर नजर रखने वाले लोगों का कहना है कि ओवैसी मुसलमान वोटरों पर प्रभाव डालने में सफल  रहेंगे। ओवैसी की पार्टी बीते कुछ सालों से बिहार के सीमांचल क्षेत्र में काफी सक्रिय है। बताया जाता है कि कटिहार और किशनगंज क्षेत्र में ओवैसी की पार्टी राजद को नुकसान पहुंचा सकते हैं। बिहार में मुस्लिम और यादव को राजद का परंपरागत वोटर माना जाता है। लेकिन अब ओवैसी खुद मैदान में हैं और उन्होंने एक यादव समाज से संबंध रखने वाले नेता के पार्टी से गठबंधन भी कर लिया है, तो ऐसे में राजद को नुकसान हो सकता है। आप को बता दें कि सीमांचल की 15 से 17 सीटों पर मुसलमान मतदाता जहां निर्णायक होते हैं। वहीं कई ऐसी सीटें भी हैं, जहां मुस्लिम मतदाता परिणाम को प्रभावित करते हैं।   

ये पार्टियां ओवैसी के साथ जाने से बचेंगी 

बिहार की राजनीति के जानकारों का मानना है किओवैसी की कट्टर छवि उन पार्टियों के लिए गठबंधन में शामिल होने के लिए आड़े आएगी, जिन्हें हिंदू मतदाताओं के भी वोट चाहिए। बिहार में कई पार्टियां ऐसी हैं, जो जातीय समीकरण को साधते हुए सत्ता तक पहुंचती रही हैं। ऐसे में वैसी पार्टियां ओवैसी के गठबंधन में जाने से बचेंगी।

भाजपा और विपक्ष से बना रखी है समान दूरी

बिहार में कई छोटी पार्टियां हैं, जिन्होंने भाजपा और महागठबंधन से दूरी बना कर रखी है। वे ऐसे गठबंधन की तलाश में हैं जिसमें शामिल होकर अपने रूतबे को बढ़ाने की कोशिश करेंगे। ऐसे में ओवैसी और देवेंद्र यादव  की गठबंधन को विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। बिहार की राजनीति को नजदीक से जानने वोलों का कहना है कि इसमें कोई शक नहीं कि ओवैसी और देवेंद्र यादव की साथ में एंट्री से बिहार में तीसरे मोर्चे की संभावना को बल मिला है।

महागठबंधन से  छोटे दल नाराज

 बताया जा रहा है कि बिहार में विपक्षी दलों के महागठबंधन में शामिल छोटे दल अब तक सीट बंटवारा नहीं होने और गठबंधन में स्थिति स्पष्ट नहीं होने के कारण काफी नाराज हैं। ऐसे में कहा जा रहा है कि मौजूदा राजनीतिक स्थिति का फायदा उठाने का ओवैसी के पास बहुत अच्छा मौका है। महागठबंधन को छोड़कर जो भी दल इस गठबंधन में आएंगें, उससे यह गठबंधन और मजबूत होगा। 

ओवैसी का उम्मीदवारों का ऐलान

आप को बता दें कि असदुद्दीन ओवैसी पहले ही बिहार विधानसभा चुना 2020 लड़ने का ऐलान कर चुके हैं। सितंबर महीने की शुरुआत में ओवैसी की पार्टी ने बिहार चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों का ऐलान भी कर दिया था। एआईएमआईएम 50 सीटों पर चुनाव लड़ने का पहले ही ऐलान कर चुकी है। 

पिछले चुनाव में ओवैसी की पार्टी का हाल  

पिछले विधानसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी छह सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारी थी और सभी प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा था। पांच सीटों पर तो उनके प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई थी। साल 2019 में किशनगंज सीट पर हुए उपचुनाव में एआईएमआईएम के कमरूल होदा ने जीत दर्ज की थी। राजनीति के जानकार  भी कहते हैं कि ओवैसी और योगेंद्र यादव के साथ आने के बाद तय है कि यादव और मुस्लिम वोट बैंक का बिखराव होगा, जो राजद के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। ओवैसी किसके वोट बैंक में सेंधमारी करते हैं ये तो नतीजों के बाद ही पता चलेगा। लेकिन उनकी एंट्री ने बिहार चुनाव को दिलचस्प जरूर बना दिया है।

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