गांधी परिवार के करीबी और ऑफर के बावजूद कभी मंत्री नहीं बने अहमद पटेल

25 Nov, 2020 09:00 IST|मो. जहांगीर आलम
फोटो : सौ. सोशल मीडिया

जब भाजपा को मुंह की खानी पड़ी

26 साल की उम्र में पहुंचे संसद पटेल

सोनिया ने बढ़ाया था राज्यसभा के लिए नाम

नई दिल्ली : कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल (Ahmad Patel) का आज निधन हो गया है। वह कोरोना संक्रमित (Corona Positive) होने के बाद करीब एक महीने से अस्पताल में भर्ती थे। गुरुग्राम के मेदांता हॉस्पीटल में उनका इलाज चल रहा था बुधवार की सुबह करीब 3.30 उन्होंने अंतिम सांस ली। अहमद पटेल  71 वर्ष के थे। 

देश की सियासत में मजबूत दखल रखने वाले अहमद पटेल कभी साउथ गुजरात यूनिवर्सिटी टीम के शानदार बल्लेबाज थे, लेकिन उनकी पारी सियासत के पिच पर ही निखरी। वह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) के राजनीतिक सलाहकार, पूर्व पीएम राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) के संसदीय सचिव, इंदिरा और संजय गांधी के भी करीबी रहे।

जब भाजपा को मुंह की खानी पड़ी

अहमद पटेल को कांग्रेस का चाणक्य और संकटमोचक माना जाता था, जो हर परिस्थिति में पार्टी को मजबूत करने में लगे रहते थे। एक उदाहरण साल 2017 में देखने को मिला, जब गुजरात में राज्यसभा के चुनाव हो रहे थे। इस चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटेदार मुकाबला हुई थी। चुनाव में सीधा मुकाबला कांग्रेस के अहमद पटेल और भाजपा के अमित शाह के बीच में था। 

भाजपा के पास दो नेताओं को राज्यसभा भेजने के लिए पूरे नंबर थे, लेकिन उसने तीसरी सीट पर भी दावा ठोक दिया और भाजपा ने अमित शाह, स्मृति ईरानी के अलावा बलवंत सिंह राजपूत का पर्चा कांग्रेस के दिग्गज नेता के सामने भरवा दिया। क्योंकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शंकर सिंह वाघेला समेत पांच विधायकों ने पार्टी छोड़ दी। जिससे भाजपा की महत्तवाकांक्षा को और बल मिल गया। 

कांग्रेस के उस दिग्गज को हराने के लिए भाजपा ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। लेकिन बागी वाघेला खेमे की क्रॉस वोटिंग और उस समय भाजपा चीफ अमित शाह की तमाम सियासी चालों को नाकाम करते हुए अहमद पटेल ने चुनावी बाजी जीत ली।  

26 साल की उम्र में संसद पहुंचे थे पटेल

दिल्ली के सियासी गलियारों में अहमद भाई के नाम से मशहूर अहमद पटेल, कांग्रेस के टिकट पर उस वक्त चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे, जब पूरे देश में कांग्रेस बुरी तरह से हार गई थी। यहां तक की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी हार झेलनी पड़ी थी। मगर अहमद पटेल 1977 में 26 साल की उम्र में गुजरात के भरुच से लोकसभा चुनाव जीतकर तब के सबसे युवा सांसद बने थे। 1980 और 1984 का भी चुनाव वो भरुच से जीते, लेकिन 1989 और 1991 के चुनाव में उन्हें हार झेलनी पड़ी।

सोनिया ने बढ़ाया था राज्यसभा के लिए नाम

 1980 के चुनाव में जब कांग्रेस जबरदस्त जीत के साथ केंद्र की सत्ता में लौटी, तो प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने अहमद को कैबिनेट में शामिल करना चाहा, लेकिन उन्होंने संगठन में काम करना पसंद किया।

वहीं, 1991 में जब पीवी नरसिम्हाराव के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी और राव के हाथों में कांग्रेस की कमान पहुंची। जब 1993 में उन्होंने सोनिया से पूछा कि क्या आप किसी को राज्यसभा भेजना चाहती हैं, तो सोनिया गांधी ने कई नेताओं को नजरअंदाज कर अहमद पटेल का नाम आगे बढ़ा दिया और तब से लेकर अपने जीवन के आखिरी दिन तक पटेल राज्यसभा सदस्य बने रहे। 

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गुजरात कांग्रेस की संभाली कमान

अहमद पटेल 1977 से 1982 तक गुजरात की यूथ कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे। सितंबर 1983 से दिसंबर 1984 तक वो ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के जॉइंट सेक्रेटरी रहे। 1985 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी के संसदीय सचिव बने और जनवरी 1986 में गुजरात कांग्रेस की कमान भी संभाली।

कांग्रेस का चाणक्य कहा जाता था

अहमद पटेल को 10 जनपथ का चाणक्य कहा जाता था। सोनिया गांधी के सबसे करीब और कांग्रेस के बेहद ताकतवर असर वाले अहमद खुद को साइलेंट मोड पर रखते थे। गांधी परिवार के अलावा किसी को नहीं पता कि उनके दिमाग में क्या रहता था। साल 2004 से 2014 तक केंद्र की सत्ता में कांग्रेस के रहते हुए अहमद पटेल की राजनीतिक ताकत सभी ने देखी है।  

कांग्रेस संगठन ही नहीं बल्कि सूबे से लेकर केंद्र तक में बनने वाली सरकार में कांग्रेस नेताओं का भविष्य भी अहमट पटेल तय करते थे। यूपीए सरकार में पार्टी की बैठकों में सोनिया जब भी ये कहतीं कि वो सोचकर बताएंगी, तो मान लिया जाता कि वो अहमद पटेल से सलाह लेकर फैसला करेंगी। इतना ही नहीं कांग्रेस की कमान भले ही गांधी परिवार के हाथों में रही हो, लेकिन अहमद पटेल के बिना पत्ता भी पार्टी में नहीं हिलता था। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।

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