धरती को कुछ हफ्तों के लिए मिलेगा अपना 'मिनी मून', जानिए कब और कहां देख सकेंगे आप

23 Nov, 2020 13:01 IST|मो. जहांगीर आलम
फोटो : सौ. सोशल मीडिया

माइनर प्लैनेट सेंटर ने पहले इसे एस्टेरॉयड समझा

हिल स्फेयर में गुरुत्वाकर्षण शक्ति काम करती है 

 आखिर ये मिनी मून चीज है क्या 

नई दिल्ली : खगोलीय घटनाओं (Celestial) में दिलचस्पी रखने वालों के लिए एक अच्छी खबर है। आगामी 1 दिसंबर को बड़ा खगोलीय घटना होने जा रहा है। दरअसल हमारी पृथ्वी (Earth) को कुछ समय के लिए अपना एक मिनी मून (Mini Moon) मिल रहा है। यह मिनी मून धरती की ओर बढ़ रहा है। इतना ही नहीं गत 8 नवंबर को इसने पृथ्वी के हिल स्फेयर एरिया में प्रवेश भी कर लिया है । खास बात यह है कि यह मिनी मून 1 दिसंबर के बाद से कुछ हफ्तों तक हमारी पृथ्वी के चक्कर लगाएगा । इसके बाद यह जहां से आया है वहीं वापस चला जाएगा । 1 दिसंबर को यह धरती के सबसे नजदीक होगा। 

6 मीटर की इस अंतरिक्षीय वस्तु को पहली बार 17 सितंबर को देखा गया था। नासा के वैज्ञानिकों ने इसे पैनोरमिक सर्वे टेलिस्कोप एंड रैपिड रेस्पॉन्स सिस्टम-1  से देखा था। तब यह पाइसेस और सेटस नक्षत्रों के बीच था।

माइनर प्लैनेट सेंटर ने पहले इसे एस्टेरॉयड समझा

मैसाच्यूसेट्स के कैंब्रिज स्थित माइनर प्लैनेट सेंटर ने पहले इसे एस्टेरॉयड समझा। फिर इसका नाम दिया  2020SO गया। लेकिन बाद में जब साइंटिफिक गणना की गई तो पता चला कि कुछ समय के लिए धरती अपने लिए एक मिनी मून ला रही है। या यूं कहें कि यह मिनी मून धरती की ओर आ रहा है। 8 नवंबर को यह धरती के हिल स्फेयर एरिया में प्रवेश कर चुका था। 

हिल स्फेयर में गुरुत्वाकर्षण शक्ति काम करने लगती है 

हिल स्फेयर यानी धरती से 30 लाख किलोमीटर की दूरी पर। इसी हिल एरिया में धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति काम करने लगती है। ताकि दूसरे ग्रहों की ताकत से कोई वस्तु उनकी तरफ न चली जाए। वैज्ञानिकों का मानना है कि 1 दिसंबर को यह मिनी मून धरती के सबसे नजदीक होगा। यानी धरती से मात्र 43,000 किलोमीटर की दूरी पर।

 आखिर ये मिनी मून चीज है क्या 

जिस चीज को वैज्ञानिक एस्टेरॉयड समझ रहे थे आखिर में वो अपना ही भेजा हुआ एक सैटेलाइट लग रहा है। यह कोई मजबूत पत्थर नहीं बल्कि एल्युमिनियम का खाली सिलेंडर जैसी आकृति है। जिसे सोलर रेडिएशन तेजी से धरती की तरफ भेज रहा है। इस चीज को पुख्ता करने के लिए वैज्ञानिकों ने 170 बार इसका अलग-अलग जगहों से ऑब्जरवेशन किया। तब जाकर ये पता चला कि यह सर्वेयर लूनर लैंडर का एक हिस्सा है। 

अपोलो रॉकेट का बूस्टर

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के वैज्ञानिकों को लगा कि 1960 से 70 के बीच नासा द्वारा भेजे गए सर्वेयर लूनर लैंडर के अपोलो रॉकेट का बूस्टर है। क्योंकि इसके ऊपर टाइटेनियम डाइऑक्साइड का पेंट लगा है। यह बात उसके स्पेक्ट्रोस्कोपिक एनालिसिस से पता चली। अब यही घूमता हुआ धरती की ओर आ रहा है। जो 1 दिसंबर से अगले कुछ हफ्तों तक धरती के दो चक्कर लगाएगा। इसके बाद अगले साल यह वापस सूर्य की कक्षा में यानी अंतरिक्ष में चला जाएगा।  

वैज्ञानिकों की गणना के मुताबिक, द सेंटोर 1 दिसंबर को सुबह 3.57 बजे धरती के बगल से निकलेगा। यानी भारतीय समयानुसार दोपहर 2.27 बजे यह धरती के बगल से गुजरेगी। तब इसकी धरती से दूरी करीब 43 हजार किलोमीटर होगी। यानी हमारे जियोसिनक्रोनस ऑर्बिट से मात्र 8000 किलोमीटर दूर से। अमेरिका के लोग इसे अलसुबह रोशनी होने से पहले देख पाएंगे। भारत या किसी अन्य देश में यह दिखाई नहीं देगा। 

इसके बाद यह धरती के पास 74 साल बाद यानी साल 2074 में वापस आएगा। तब यह धरती से करीब 14.96 लाख किलोमीटर की दूरी से निकलेगा। इसके धरती के पास से गुजरने से किसी प्रकार का खतरा नहीं है। 

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