स्वामी विवेकानंद : एक ऐसा देशभक्त संन्यासी, जिसने बदली युवाओं की सोच

12 Jan, 2021 09:10 IST|अनूप कुमार मिश्रा
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राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाते हैं स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन

12 जनवरी 1863 को कोलकाता के एक कुलीन बंगाली परिवार में हुआ था जन्म

विवेकानंद को एक देशभक्त संन्यासी के रूप में माना जाता है

स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) अपने विचार और आध्यात्म की वजह से न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी पूजे जाते हैं। उनके जन्मदिन को युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। 12 जनवरी को जन्में स्वामी विवेकानंद ने छोटी सी उम्र में वह ज्ञान प्राप्त कर लिया था, जिसे सतत साधना के बाद ऋषि-मुनि प्राप्त करते हैं। आइए जानते हैं स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें।

स्वामी विवेकानंद का वास्तविक नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। कलकत्ता के एक कुलीन बंगाली कायस्थ परिवार में जन्मे विवेकानंद बचपन से ही आध्यात्मिकता की ओर झुके हुए थे। वे अपने गुरु रामकृष्ण देव से काफी प्रभावित थे, जिनसे उन्होंने सीखा कि सारे जीवों मे स्वयं परमात्मा का ही अस्तित्व हैं। इसलिए मानव जाति अथेअथ जो मनुष्य दूसरे जरूरत मंदो मदद करता है या सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है। 

रामकृष्ण की मृत्यु के बाद विवेकानंद ने बड़े पैमाने पर भारतीय उपमहाद्वीप का दौरा किया और ब्रिटिश भारत में मौजूदा स्थितियों का प्रत्यक्ष ज्ञान हासिल किया। बाद में विश्व धर्म संसद 1893 में भारत का प्रतिनिधित्व करने, संयुक्त राज्य अमेरिका गए थे। विवेकानंद ने संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोप में हिंदू दर्शन के सिद्धांतों का प्रसार किया और कई सार्वजनिक और निजी व्याख्यानों का आयोजन किया। भारत में विवेकानंद को एक देशभक्त संन्यासी के रूप में माना जाता है और उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

गुरू के चरणों में किया जीवन समर्पित

स्वामी विवेकानन्द ने अपना जीवन अपने गुरुदेव स्वामी रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर दिया था। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत की परवाह किए बिना, स्वयं के भोजन की परवाह किए बिना गुरु सेवा में सतत हाजिर रहे।

विवेकानंद की मौत से जुड़ी कई कहानियां

गोपाल श्रीनिवास बनहती द्वारा विवेकानंद पर लिखी गई किताब के मुताबिक उन्हें जीवन के आखिरी समय में अस्थमा, मधुमेह और इनसोम्निया (नींद की बीमारी) जैसी बीमारियों ने जकड़ लिया था। बावजूद इसके विवेकानंद ध्यान, लेखन के अलावा रामकृष्ण मिशन के फैलाव के काम में लगे रहे थे।

विवेकानंद पर लिखी गई राजागोपाल चट्टोपाध्याय की किताब के मुताबिक विवेकानंद अपने आखिरी दिनों में बेलूर मठ में ही रहने लगे थे। उनके शिष्यों के अनुसार जीवन के अन्तिम दिन 4 जुलाई 1902 को भी उन्होंने अपनी ध्यान करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रात: दो तीन घण्टे ध्यान किया और ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरन्ध्र को भेदकर महासमाधि ले ली। बेलूर में गंगा तट पर चन्दन की चिता पर उनकी अंत्येष्टि की गयी। इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का सोलह वर्ष पूर्व अन्तिम संस्कार हुआ था।

मौत को लेकर सच साबित हुई थी भविष्यवाणी

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु के साथ ही उनकी वह भविष्यवाणी सत्य साबित हुई थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि वो 40 साल से ज्यादा की उम्र तक नहीं जिएंगे। उनकी मृत्यु 39 साल की आयु में हुई थी। वह लंबे समय तक अस्थमा, मधुमेह और इनसोम्निया से ग्रसित थे, जिससे उनका चलना-फिरना भी बिल्कुल बंद हो गया था।

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