नई शिक्षा नीति : क्या खत्म होगा कॉन्वेंट कल्चर, जानिए सरकार की असल मंशा क्या है ?

30 Jul, 2020 15:01 IST|Sakshi
कॉन्सेप्ट फोटो (सौजन्य सोशल मीडया)

देश में नई शिक्षा नीति होगी लागू

प्राथमिक और उच्च शिक्षा के बनेंगे नए मानक

कॉन्वेंट कल्चर पर भी क्या पड़ेगा असर ?

नई शिक्षा नीति: केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने देश में नई शिक्षा नीति लाने का फैसला लिया है। जिसके तहत अब उच्च शिक्षा के लिए नए मानक तैयार किये जा रहे हैं।  इसके साथ ही शिक्षा मंत्रालय ने उच्च शिक्षा के लिए एक ही रेगुलेटरी बॉडी बनाने का फैसला भी लिया है। जिसके तहत अब  'नेशनल हायर एजुकेशन रेगुलेटरी अथॉरिटी (एनएचईआरए) या हायर एजुकेशन कमिशन ऑफ इंडिया' अब उच्च शिक्षा के काम को देखेगा। 

आपको बतादें कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में ये बदलाव करीब चौंतीस साल बाद किया गया है। साल 1986 में कुछ परिवर्तन किए गये फिर दोबारा 1992 में कुछ और सुधार किए गए थे। इस बारे में केंद्र सरकार का मानना है कि शिक्षा के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सुधार की जरूरत है। जिससे भारत दुनिया भर में शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी देश बन सके। तो वहीं अब सरकार प्राथमिक स्तर पर भी बड़े पैमाने पर बदलाव करने जा रही है। 

क्या शिक्षा नीति में थी बदलाव की जरूरत ?

सरकार ने प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक में बदलाव का फैसला लिया है। दरअसल इसकी जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। देश को आजादी मिलने के दौरान जो शिक्षा की पद्धति चली आ रही थी उस समय से लेकर आज तक देश की शिक्षा प्रणाली में ज्यादा बदलाव नहीं हुए। जिसके चलते समाज कई वर्गों में बंटता नजर आया। देश में अमीरों के लिए अलग व्यवस्था तो गरीबों के लिए दूसरी व्यवस्था चलती रही है। जहां उच्च आय वर्ग के लोग अपने बच्चों को कॉन्वेन्ट में पढ़ा रहे हैं तो वहीं निम्न आय वर्ग के लोग सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाते रहे हैं। जिसके चलते समाज में हीन भावना और उच्च वर्ग के प्रति आक्रोश भी लोगों में देखा गया। 

मौजूदा एजुकेशन सिस्टम के समाज पर पड़ रहे प्रभाव पर नहीं दिया गया ध्यान !

दरअसल इसकी मुख्य वजह ये रही कि, आजादी के बाद से ही इस ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया गया। देश में पनप चुके कॉन्वेंट कल्चर को सम्मान के नजरिए से देखा जाता रहा है ,वहीं भारतीय पारंपरिक शिक्षा पद्धित को दोयम दर्जा हासिल हो गया। यह पूरी व्यवस्था क्यों बिगड़ी आइए समझते हैं।

भारतीय शिक्षण पद्धति दुनिया में थी सर्वश्रेष्ठ 

देखा जाए तो भारतीय पारंपरिक शिक्षण पद्धति जो आज देश में लगभग खत्म ही हो चुकी है, कभी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ शिक्षण पद्धति के रूप में जानी जाती थी। कई वर्षों के लगातार प्रयास से यह विकसित हुई थी। इस पद्धति में छात्रों का संपूर्ण विकास होता था। शारिरिक, मानसिक, विकास के साथ-साथ उनमें नैतिकता पर भी ध्यान दिया जाता था। लेकिन इस पूरी शिक्षण पद्धति को सोची समझी रणनीति के तहत खत्म कर दिया गया। 

मैकाले शिक्षा पद्धति का क्या रहा असर ?
लार्ड मैकाले में जबरदस्त दूरदर्शिता थी, वह इस बात को जानता था कि दुनिया को अगर किसी देश से चुनौती मिल सकती है, तो वह भारत ही हो सकता है। इस लिए उसने भारतीय समाज की पहचान को खत्म करने की योजना बनाई थी। 

लार्ड मैकाले ने 1934 में जो शिक्षा पद्धति अपनाई वह इसी योजना का हिस्सा था। इस बारे में खुद मैकाले ने कहा था कि, जो शिक्षा पद्धति वह लागू कर रहा है, उसके पाठ्यक्रम के अनुसार यहाँ के शिक्षित युवक देखने में हिंदुस्तानी होंगे, लेकिन उनका दिमाग अंग्रेजियत से भरा होगा। इस योजना में उसे सफलता भी मिली। यही वजह है कि आज हम तथाकथित 'सभ्य समाज' में अपनी भाषा में बोलने में भी शर्म महसूस करते हैं। आज हम अंग्रेजो के गुलाम तो नहीं फिर भी अंग्रेजियत के गुलाम जरूर बन चुके हैं। 

कोठारी कमीशन ने भी नहीं दिया ध्यान

देश में आजादी मिलने के बाद साल 1964 में कोठारी कमीशन लागू किया गया था, लेकिन उस वक्त भी  इस कमीशन ने भाषा, विज्ञान और कृषि तंत्र पर विशेष ध्यान दिया गया, क्योकि उस वक्त  देश को एक दिशा प्रदान करना था। जिसके बाद साल 1986 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की अध्यक्षता में नई शिक्षा नीति बनाई गई जो अब तक चलती आ रही है। 

स्कूली शिक्षा के लिए तैयार हुआ नया डिजाइन

नई शिक्षा नीति के तहत अब केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा जारी की गई नई शिक्षा नीति के अंतर्गत स्कूली शिक्षा में बड़े बदलाव किए गए हैं। स्कूली शिक्षा के लिए एक नई विकास-उपयुक्त पाठ्यचर्या और शैक्षणिक संरचना 'पांच प्लस तीन प्लस तीन प्लस चार' डिजाइन पर विकसित की गई है। इसके तहत छात्रों को चार विभिन्न वर्गों में बांटा गया है। पहले वर्ग में तीन से छह वर्ष की आयु के छात्र होंगे, जिन्हें प्री प्राइमरी या प्ले स्कूल से लेकर कक्षा दो तक की शिक्षा दी जाएगी। इसके बाद कक्षा दो से पांच तक का पाठ्यक्रम  तैयार किया जाएगा। उसके बाद कक्षा पांच से आठ और फिर अंत में चार वर्षों के लिए कक्षा नौ से लेकर 12वीं तक के छात्रों को ध्यान में रखते हुए शैक्षणिक कार्यक्रम बनाया गया है।

एनसीईआरटी तैयार करेगा पाठ्यक्रम
इस पूरे पाठ्यक्रम को तैयार करने की जिम्मेदारी NCERT को दी गई है। इसके साथ ही  प्रारंभिक बाल्यावस्था के दौरान बच्चों की देखभाल पर विशेष जोर रहेगा। तीन-छह वर्ष के बीच के सभी बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक-बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा सुनिश्चित करने का प्रावधान किया जा रहा है। तीन से पांच वर्ष की आयु के बच्चों की जरूरतों को आंगनवाड़ियों की वर्तमान व्यवस्था द्वारा पूरा किया जाएगाऔर पांच से छह वर्ष की उम्र को आंगनवाड़ी/स्कूली प्रणाली के साथ खेल आधारित पाठ्यक्रम के माध्यम से पूरा किया जाएगा ।

नई शिक्षा नीति की आवश्यकता क्यों ?

1.देश में जारी मौजूदा शिक्षा नीति उन अपेक्षाओं पर अभी तक खरा नहीं उतर पा रही है जिसकी उम्मींद की गई थी। 

2. देश में जिस तरह के नैतिक आचार-व्यवहार का परिचय दिया जाना चाहिए उसको नई पीढ़ी अपनाने में विफल रही।

3.इस  एजुकेशन सिस्टम में ज्ञान से ज्यादा महत्त्व अच्छे अंकों को दिया जाने लगा है।

4. शिक्षा में असमानता राष्टीय एकता के लिए खतरा उत्पन्न कर सकती है। इसे एक समान पाठ्यक्रम अपनाकर दूर किया जा सकता है।

 5. मौजूदा शिक्षा नीति में रोजगार पाने तक ही सीमित रही, व्यक्ति के सर्वांगीण विकास  पर उतना ध्यान नहीं दिया गया।  


देश में क्या खत्म होगा कॉन्वेन्ट कल्चर ?
नई शिक्षा नीति को लेकर सरकार ने अपना एजेंडा साफ कर दिया है। सरकार देश में शिक्षा के मामले में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक में बदलाव करने जा रही है। सरकार का मकसद है कि शिक्षण पद्धति में एक रूपता रहे और छात्रों का सर्वागीण विकास होने के साथ ही मौजूदा दौर के हिसाब से रोजगार परक शिक्षा भी मिल सके। लेकिन सवाल ये उठता है कि देश में अच्छी शिक्षा के मानक बन चुके कॉन्वेंट कल्चर को भी खत्म करने की सरकार की मंशा है, फिलहाल ये साफ नही है। लेकिन नई शिक्षा नीति के तहत बदलाव अगर होता है, तो निश्चित रूप से इसके अंतर्गत भारतीय संस्कृति और संभ्यता को ध्यान  में रखते हुए भारतीय पारंपरिक शिक्षण पद्धति का समावेश कमोबेश जरूर किया जाएगा। ऐसे में देश में व्याप्त कॉन्वेंट कल्चर पर कुछ ना कुछ असर पड़ना स्वाभाविक है।

सरकार के इस निर्णय से इतना तो साफ है कि नई शिक्षा नीति के तहत भारतीय संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान, सभ्यता, संस्कृत भाषा के अलावा स्थानीय भाषा को बढ़ावा दिया जा सकता है।   

- विमल श्रीवास्तव, वरिष्ठ सब एडिटर, साक्षी समाचार
 

Load Comments
Hide Comments
More News
आंध्र-प्रदेश
मुख्य समाचार
.