जीवन का यथार्थ और समाज का आईना था प्रेमचंद का साहित्य

30 Jul, 2020 23:57 IST|Sakshi
फोटो : सौ, सोशल मीडिया

प्रेमचंद की कहानियां 

प्रेमचंद को पढ़ने का शौक था 

जीवन की परिस्थियां और प्रेमचंद

हिन्दी साहित्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले मुंशी प्रेमचंद को हिंदी और उर्दू के महानतम लेखकों में शुमार किया जाता है। प्रेमचंद की रचनाओं को देखकर बंगाल के मशहूर उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें 'उपन्यास सम्राट' की उपाधि दी थी।  प्रेमचंद ने कहानी और उपन्यास में एक नई परंपरा की शुरुआत की जिसने आने वाली पीढ़ियों के साहित्यकारों का मार्गदर्शन किया। प्रेमचंद ने जो भोगा, जो देखा वही लिखा। आज उसी मुंशी प्रेमचंद की जयंती है। 

जीवन की परिस्थियां और प्रेमचंद

प्रेमचंद का जन्म आज ही के दिन 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के नजदीक लमही गांव में हुआ था। उनका मूल नाम धनपतराय था। पिता का नाम अजायब राय था और वे डाकखाने में मामूली नौकरी करते थे। वे जब सिर्फ आठ साल के थे तब मां का निधन हो गया। आठ साल की उम्र से जो विषम परिस्थितियों का सामना धनपतराय का शुरू हुआ वह अपने जीवन के अन्त तक लगातार उससे जूझते रहे। 

मां के देहांत के बाद उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली। जिसके कारण बालक प्रेम और स्नेह को चाहते हुए भी ना पा सका। उनका जीवन गरीबी में ही पला। पहनने के लिए कपड़े न होते थे और न ही खाने के लिए पर्याप्त भोजन मिलता था। इन सबके अलावा घर में सौतेली मां का व्यवहार भी उनके हालात को खस्ता करने वाला था। 

महज़ 15 साल की उम्र में शादी 

जब उनकी उम्र महज़ 15 साल थी तो पिता ने उनकी शादी उम्र में बड़ी लड़की से करा दी। शादी के एक साल बाद पिता का निधन हो गया और अचानक ही उनके सिर पांच लोगों की गृहस्थी और खर्च का बोझ आ गया। प्रेमचन्द की आर्थिक विपत्तियों का अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता है कि पैसे के अभाव में उन्हें अपना कोट बेचना पड़ा और पुस्तकें बेचनी पड़ी।

प्रेमचंद को पढ़ने का शौक था 

प्रेमचंद को बचपन से ही पढ़ने का शौक था और वे वकील बनना चाहते थे, लेकिन गरीबी के कारण सपना अधूरा रह गया। हिंदी साहित्य के इतिहासकार बताते हैं कि प्रेमचंद को उपन्यास पढ़ने का ऐसा चस्का था कि बुकसेलर की दुकान पर बैठकर सैकड़ों उपन्यास पढ़ डाले। तेरह साल की उम्र से ही प्रेमचंद ने लिखना आरंभ कर दिया था। शुरू में उन्होंने कुछ नाटक लिखे फिर बाद में उर्दू में उपन्यास लिखना आरंभ किया। इस तरह उनका साहित्यिक सफर शुरू हुआ जो मरते दम तक साथ-साथ रहा। 

1905 में प्रेमचंद की दूसरी शादी

प्रेमचंद की दूसरी शादी 1905 में हुई। दरअसल पहली पत्नी पारिवारिक कटुताओं के कारण घर छोड़कर मायके चली गई और कभी लौटकर वापस नहीं आई। प्रेमचंद ने दूसरी शादी एक विधवा स्त्री शीवरानी देवी से की थी। इसके बाद प्रेमचंद साहित्य की सेवा में लग गए। दूसरी शादी के बाद जीवन में कुछ खुशियां आई, जिसके बाद उन्होंने लिखना शुरू कर दिया।  

प्रेमचंद की कहानियां 

बहुआयामी प्रतिभा के धनी प्रेमचंद ने कहानी, नाटक, उपन्यास, लेख, आलोचना, संस्मरण, संपादकीय जैसी अनेक विधाओं में साहित्य का सृजन किया है। उन्होंने कुल 300 से ज़्यादा कहानियां, 3 नाटक, 15 उपन्यास, 10 अनुवाद, 7 बाल-पुस्तकें लिखीं। इसके अलावा सैकड़ों लेख, संपादकीय लिखे जिसकी गिनती नहीं है। 

प्रेमचंद हिन्दी साहित्य ऐसे लेखक रहे, जिन्होंने समाज के स्याह पक्ष को सामने रखा। उन्होंने अपने कहानी, उपन्यास में जो कुछ भी लिखा वह तत्कालीन समाज की हकीक़त थी। 'गोदान' के होरी में किसान की दुर्दशा बयान की तो 'ठाकुर का कुंआ' में समाजिक हक से महरूम लोगों का दर्द। प्रेमचंद की कृतियों में जाति भेद और उस पर आधारित शोषण तथा नारी की स्थिति का जैसा मार्मिक चित्रण किया गया, वह आज भी दुर्लभ है। प्रेमचंद एक तरफ जहां भूख से विवश होकर आत्महत्या करते किसान की कहानी कहते थे तो दूसरी तरफ ईदगाह में हामिद के लड़कपन में बुज़ुर्गों के लिए फिक्र दिखाकर लोगों का दिल छूने में सफल रहे। 

अपनी रचना 'गबन' के जरिए से एक समाज की ऊंच-नीच, 'निर्मला' से एक स्त्री को लेकर समाज की रूढ़िवादिता और 'बूढी काकी' के जरिए 'समाज की निर्ममता' को अलग और रोचक अंदाज उन्होंने पेश किया, उसकी तुलना नही है। इसी तरह से पूस की रात, बड़े घर की बेटी, बड़े भाईसाहब, आत्माराम, शतरंज के खिलाड़ी जैसी कहानियों से प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य की जो सेवा की है, वो अद्भुत है। जीवन के आखिरी दिनों में वे उपन्यास मंगलसूत्र लिख रहे थे जिसे वे पूरा नहीं कर सके। इसमें साहित्य साधना के कष्टों को उजागर किया था। 

लंबी बीमारी के बाद 8 अक्टूबर 1936 में उन्होंने अंतिम सांसें लीं। प्रेमचंद ने हिंदी उपन्‍यास को जिस ऊंचाई तक पहुंचाया वो आने वाली पीढ़ियों के उपन्‍यासकारों के लिए एक चुनौती बनी रही। प्रेमचंद के उपन्‍यास और कहानियों का भारत और दुनिया की कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है। प्रेमचंद हिंदी साहित्य में एक मील का पत्थर हैं और बने रहेंगे।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने प्रेमचंद के बारे में कहा है कि ''प्रेमचंद ने अतीत का गौरव राग नहीं गाया, न ही भविष्य की हैरत-अंगेज कल्पना की। वह ईमानदारी के साथ वर्तमान काल की अपनी वर्तमान अवस्था का विश्लेषण करते रहे।''

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