नवीन पटनायक पिछले 20 वर्षों से हैं ओडिशा के लोकप्रिय CM, बेदाग छवि है उनकी यूएसपी

16 Oct, 2020 09:34 IST|संजय कुमार बिरादर
नवीन पटनायक (फाइल फोटो)

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने राजनीति में प्रवेश के बाद कभी हार का स्वाद नहीं चखा। वह अब ओडिशा के सबसे लंबे समय तक रहने वाले मुख्यमंत्री बन गए हैं। पटनायक साल 2000 में पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। उन्हें प्राकृतिक आपदाओं के कुशल संचालन के लिए जाना जाता है और इस मामले में अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से भी उनकी प्रशंसा होती रही है। दुनिया के सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा और कांग्रेस के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के शासनकाल में भी ओडिशा में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के जलवों पर कोई असर नहीं देखा गया। पिछले 20 वर्षों से भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां ओडिशा में पटनायक सरकार कड़ी टक्कर तक नहीं दे पाई हैं। इसकी वजह हैं नवीन पटनायक का मजबूत शासन बताया जाता है।

पिता के निधन के बाद बीजेडी की स्थापना

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि नवीन पटनायक ओडिशा की राजनीति की धुरी हैं। देश की आजदी से एक साल पहले जन्म लेने वाले नवीन पटनायक को राजनीति विरासत में मिली है। उनके पिता बीजू पटनायक राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं।  पिता की मौत के बाद 1998 में नवीन ने पिता के नाम पर राजनीतिक राजनीतिक दल का गठन किया।  लोकसभा का उपचुनाव लड़कर सांसद के रूप में अपनी राजनीतिक करियर की शुरूआत करने वाले पटनायक केंद्र में भी मंत्री बने।  साल 2000 में बीजेपी की मदद से उन्होंने उड़ीसा के मुख्यमंत्री की कमान संभाली और तब से  कभी पीछे मुडकर नहीं देखा।

इस वजह से भाजपा से तोड़ा नाता

हालांकि विहिप नेता स्वामी लक्ष्मणनंदा सरस्वती की हत्या के बाद हुए कंधमाल दंगों की वजह से दोनों दलों में मतभेद पैदा हुआ। इसी को देखते हुए साल 2009 में नवीन पटनायक ने बीजेपी से नाता तोड़ लिया था। यह राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में उनका 'मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ और विधानसभा की 147 में से 103 सीटें जीतीं । इससे प्रदेश की राजनीति में उनका कद बढ़ा।  नवीन पटनायक की छवि ही उनकी यूएसपी होती है। 

पटनायक की तख्तापलट की कोशिश

2004 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेडी ने भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की और पटनायक दूसरी बार सीएम बने।  उसके बाद पटनायक ने कई सियासी तूफानों का सामना किया जिनमें 2012 में उनकी ही पार्टी के नेताओं द्वारा कथित तख्तापलट का प्रयास शामिल था जब वह विदेश में थे । उस तूफान में वह और निखरकर उभरे । 
बीजद ने 2014 में मोदी लहर के बावजूद रिकार्ड जीत दर्ज की । पटनायक की पार्टी ने 147 में से 117 सीटें और लोकसभा में 21 में से 20 सीटें जीतीं ।  लेखक, कलाप्रेमी और चतुर राजनीतिज्ञ नवीन पटनायक ऊपर से भले ही शांत दिखते हों, लेकिन विरोधियों, पार्टी के बागियों के साथ ही कुदरती और सियासी तूफानों से निपटने का शऊर उन्हें बखूबी आता है और यह उनकी सफलता की कुंजी भी रहा है। 

घोटालों के आरोपों के बावजूद छवि बनाए रखने में सफल

 वह पहले बीजू पटनायक के पुत्र होने के कारण मुख्यमंत्री बने, लेकिन इसके बाद पिछले दो दशकों से राज्य में खनन और चिट फंड जैसे कई हजार करोड़ के घोटाले के बावजूद वह उड़ीसा में सत्ता में बने रहने में कामयाब रहे हैं। पटनायक ने स्नातक तक पढ़ाई की है। अपनी सरकार में भ्रष्टाचार और घोटालों के लिए मंत्रियों पर आरोप लगने के बावजूद खुद एक साफ छवि बनाए रखने में सफल रहे हैं। 

2014 और 2019 के चुनावों में भी नवीन पटनायक की लोकप्रियता कहीं से भी कम नहीं रही और बीजद का रुतबा ओडिशा में कायम रहा, जबकि जबकि देश के अन्य हिस्सों में नरेंद्र मोदी की लहर थी। बीजद ने न केवल राज्य को बरकरार रखा, बल्कि राज्य में भारतीय जनता पार्टी की लोकप्रियता में वृद्धि के बावजूद अपना वोट शेयर बढ़ाया है। बीजद ने 147 सदस्यीय ओडिशा विधानसभा में 2019 में 44.7 फीसदी के वोट शेयर के साथ 113 सीटें जीतीं। वहीं पार्टी 2014 में 43.7 फीसदी के वोट शेयर के साथ 117 सीटें जीतने में कामयाब रही।

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