उर्दू को हिन्दुस्तान से उखाड़कर कहीं और लगाने की इक़बाल की कोशिश ने उसे उल्टा नुकसान पहुंचाया

9 Nov, 2020 07:20 IST|संजय कुमार बिरादर
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बंटवारे से पहले भारत के मशहूर शायर और नेता रहे मोहम्मद इक़बाल की आज बरसी है। लोगों में अल्लामा इक़बाल के नाम से फेमस मोहम्मद इक़बाल ने ही ' सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा' गीत लिखा था। अल्लामा इक़बाल बहुत ही सरल और आम आदमी समझ सके, ऐसी शायरी लिखते थे। उन्होंने आजादी से पहले बच्चों में देश के प्रति प्रेम जगाने के लिए सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा गीत लिखा था। उन्होंने कुछ समय के लिए 'इत्तेहाद' नाम की साप्ताहिक में 1904 में प्रकाशित हुई थी। बाद में उन्होंने इस गीत को अपने संग्रह 'बांग-ए-दरा' में 'तराना-ए-हिन्दी' नाम से शामिल किया। अल्लामा का मतलब होता है महाज्ञानी होता है।

इकबाल को एक ऐसा शायर भी कहा जा सकता है जो वतनपरस्त से मज़हबपरस्त हो गया। इसकी तरंग में उन्होंने कुछ समय के लिए उर्दू में लिखना छोड़ दिया था। हालांकि उर्दू को मुसलमानों की ज़ुबान न मानने के पीछे इकबाल की कोई बड़ी सोच नहीं थी।

अहमद खान उर्दू की पैरवी कर रहे थे तो मदन मोहन मालवीय और भारतेंदु हरिश्चंद्र सरीखे दिग्गज हिंदी के खैरख्वाह बने हुए थे। इस सबके बीच राष्ट्रीयता का भी उभार हो रहा था। दरअसल इकबाल सरीखे लोगों ने भाषाओं को भी राजनैतिक सरहदों में बांध दिया। इससे उर्दू का नुकसान ही हुआ।

इकबाल ने ग़ज़ल कहना स्कूल के ज़माने से ही शुरू कर दिया था। शुरू में वे अपनी ग़ज़लें दुरुस्त करवाने के लिए डाक से उस्ताद दाग़ देहलवी के पास भेजते थे। हज़रत दाग़ को जल्द ही इकबाल के हुनर का अंदाज़ा हो गया और दो-चार ग़ज़लें देखने के बाद ही लिख दिया कि इनमे सुधार की गुंजाइश नहीं है।

लाहौर के माहौल में इकबाल की सोच पुख्ता हुई और अब वे देश-दुनिया, मजदूर क्रांति और समाजवाद की बातें करने लगे। उन्होंने ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ लिखा, क्योंकि वे मज़हबी पाबंदियों और रूढ़ियों को पसंद नहीं करते थे।

उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से बीए और जर्मनी की लुडविग मैक्सिमिलन यूनिवर्सिटी से दर्शन में पीएचडी की पढ़ाई पूरी की। इंग्लैंड में उन्हें फिर प्रोफ़ेसर अर्नाल्ड का साथ मिला। विलायत में पढ़ने के दौरान उनमें एक ख़ास परिवर्तन आया।

 उन्होंने सदियों के हिंदू-मुसलमान भाईचारे को इतर रखकर कहा कि ’ न हमारे ख़यालात एक हैं, न रिवाज़, तारीख में दर्ज जो लोग हमारे आदर्श हैं वो हिंदुओं के नहीं और जो उनके हैं, वो हमारे नहीं।’ कुछ ऐसी ही बात हिंदू संगठन भी कह रहे थे।

लोगों ने उन पर समाजवादी होने का इल्ज़ाम लगाया जिसे उन्होंने मना कर दिया, क्योंकि समाजवाद ख़ुदा की सत्ता को नहीं मानता और इस्लाम ख़ुदा के इर्द-गिर्द बुना गया तानाबाना है। 

भारत में इकबाल के जन्मदिन को उर्दू दिवस के रूप में मनाया जाता है, लेकिन इकबाल को उर्दू से जोड़कर हमने शायद ग़लत किया है। इकबाल ने उर्दू के विकास के लिए कोई ख़ास काम नहीं किया बल्कि इसका नुकसान ही किया। 

उन्होंने इसे हिंदुस्तान से उखाड़कर कहीं और लगाने की कोशिश में लगभग ख़त्म ही कर डाला। कहा जाता है कि देव नारायण पांडे ओर जय बहादुर सिंह ने उर्दू को उसका सही मुक़ाम दिलाने की जंग की थी।

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