भगवान जगन्नाथ का रथयात्रा महोत्सव, जब भक्तों से मिलने स्वयं बाहर आते हैं भगवान

22 Jun, 2020 18:48 IST|Sakshi
जगन्नाथ रथयात्रा

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का महत्व

भक्तों से मिलने स्वयं बाहर निकलेंगे भगवान जगन्नाथ 

23 जून, मंगलवार को है रथयात्रा 

उड़ीसा स्थित पुरी का जगन्नाथ धाम हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है। पुरी के जगन्नाथ धाम की यात्रा हिंदुओं के लिए काफी मायने रखती है। यहां भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। पुरी का सबसे बड़ा महोत्सव होता है भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा जो आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया से आरंभ होता है और सात दिन बाद बहुदा यात्रा के साथ इसका समापन होता है।


एक प्राचीन मान्यता के अनुसार जगन्नाथ पुरी में शंकराचार्य जी ने गोवर्धन पीठ स्थापित किया था। प्राचीन काल से ही पुरी संतों और महात्मा के कारण अपना धार्मिक, आध्यात्मिक महत्व रखती है। अनेक संत-महात्माओं के मठ यहां देखे जा सकते है। जगन्नाथ पुरी के विषय में यह मान्यता है कि त्रेतायुग में रामेश्वर धाम पावनकारी अर्थात कल्याणकारी रहें, द्वापरयुग में द्वारिका और कलियुग में जगन्नाथपुरी धाम ही कल्याणकारी है। पुरी भारत के प्रमुख चार धामों में से एक धाम है।

वहीं यह भी माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ रथयात्रा का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर होता है। साथ ही यह भी माना जाता है कि जो भक्त इस रथ को खींचता या फिर हाथ भी लगा देता है उसे यह फल प्राप्त होता है। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि उसका जन्म धन्य हो जाता है। वैसे इस रथयात्रा की तैयारी अक्षय तृतीया से शुरू हो जाती है जब रथ बनना शुरू होते हैं। पुरी में हर साल भगवान के लिए नए रथ बनकर तैयार होते हैं और उसी रथ में बैठकर भगवान जगन्नाथ निकलते हैं अपने भक्तों से मिलने।

तीनों भगवान के रथ अलग होते हैं। नंदीघोष नामक रथ 45.6 फीट ऊंचा होता है जिसमे भगवान जगन्नाथ सवार होते हैं। तालध्वज नामक रथ 45 फीट ऊंचा रहता है जिसमें भगवान बलभद्र सवार होते हैं। दर्पदलन नामक रथ 44.6 फीट ऊंचा है जिसमे देवी सुभद्रा सवार होती है।

देश के कुछ भागों में इस पवित्र रथ यात्रा को 'गुण्डीय यात्रा' के नाम से भी जाना जाता है।

भगवान जगन्नाथ के रथ को 'गरुड़ध्वज' अथवा 'कपिल ध्वज' भी कहा जाता है। लाल और पीले रंग के इस रथ की रक्षा विष्णु का वाहक गरुड़ करते हैं। इस रथ पर एक ध्वज भी स्थापित किया जाता है जिसे ‘त्रिलोक्य वाहिनी’ कहा जाता है।

प्रभु बलभद्र के रथ को ‘तलध्वज’ कहते है और यह लाल और हरे रंग के कपडे और 763 लकड़ी के टुकड़ों से बना होता है। देवी सुभद्रा की प्रतिमा ‘पद्मध्वज’ नामक रथ में विराजमान होती है जो लाल और काले कपडे और लकड़ियों के 593 टुकड़ों से बनाया जाता है।

रथ में बैठकर भगवान गुंडिचा मंदिर जाते हैं जहां वे एकादशी तक रहते हैं। इसे यूं भी कहा जाता है कि भगवान अपनी मौसी के घर जाते हैं और यहां सात दिन रहकर वे फिर वे बहुदा यात्रा के साथ वापसी करके अपने मंदिर में आकर विराजते हैं। इन सात दिनों में भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों को भी गुंडिचा मंदिर में ही दर्शन देते हैं। दूसरी ओर भगवान के आने से पहले गुंडिचा मंदिर में उनके स्वागत की तैयारियां भी की जाती है।

इस रथयात्रा के पीछे एक पौराणिक कथा छिपी है जो हमें रथयात्रा महोत्सव का कारण भी बताती है कि आखिर रथयात्रा पर भगवान क्यों निकलते हैं।

भगवान कृष्ण की नगरी द्वारका में एक बार सुभद्रा जी ने नगर देखना चाहा, तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें रथ पर बैठाकर नगर का भ्रमण कराया। इसी घटना की याद में हर साल तीनों देवों को रथ पर बैठाकर नगर के दर्शन कराए जाते हैं।

कैसे निकलती है रथयात्रा

भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बालभद्र एवं बहन सुभद्रा को जगन्नाथ मंदिर से रथ में बैठाकर गुंडिचा मंदिर ले जाया जाता है। भगवान जगन्नाथ का रथ सबसे पीछे होता है। इस रथ पर सोने के हत्थे वाला झाड़ू लगाकर रथयात्रा प्रारंभ की जाती है।

इस दौरान पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप के बीच सैकड़ों लोग तीन विशाल रथों को खींचते हैं। सबसे पहले भगवान जगन्नाथ के भाई बालभद्र का रथ प्रस्थान करता है उसके बाद बहन सुभद्रा का रथ एवं सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ का रथ निकाला जाता है। फिर शाम होते-होते यह रथयात्रा गुंडिचा मंदिर पहुंचती है। जहां भगवान अगले सात दिनों तक विराजते हैं।

यह तो हुई रथयात्रा से जुड़ी पौराणिक व आध्यात्मिक जानकारी, वहीं अगर एक भक्त की नजर से अगर आप इसे देखें तो मानेंगे कि भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों से मिलने, उनकी सुध लेने स्वयं उनके बीच आते हैं ।

फिर भगवान के रथ को हाथ लगाकर, रस्सी को खींचकर भक्तों का जीवन धन्य हो जाता है। इसीलिए भगवान के रथ को हाथ लगाने, उसे छूने को लोग लालायित रहते हैं कि किसी तरह उसे छू भी लेंगे तो उनका जीवन धन्य हो जाएगा। रथयात्रा में भाग लेने या इसका हिस्सा बनने के लिए लोग देश ही नहीं बल्कि विदशों से भी आते हैं और भगवान के रथ के सामने भजन गाते हुए नृत्य भी करते हैं और सारा माहौल भक्तिमय हो जाता है।

ये सारे वो दृश्य होते हैं जिनका रसपान करने के लिए भक्त स्वयं पुरी जाना चाहता है और इस रथयात्रा का हिस्सा बनकर अपना जीवन धन्य बनाना चाहता है।

वहीं आपको बता दें कि इस साल कोरोना महामारी के चलते रथयात्रा महोत्सव इतना भव्य नहीं हो पाएगा। 

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कुछ शर्तो के साथ पुरी रथ यात्रा निकालने की अनुमति दे दी और राज्य सरकार और केंद्र से मिलकर काम करने को कहा है।
प्रधान न्यायाधीश एस. ए. बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि राज्य सरकार अगर कोविड-19 मामलों में वृद्धि देखती है तो उसे इस रथ यात्रा को रोकने की स्वतंत्रता है। रथ यात्रा 23 जून को निर्धारित है।

सुनवाई के दौरान, प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अदालत 18 जून के अपने आदेश को संशोधित करने के लिए तैयार है, जिसमें कोविड-19 महामारी की पृष्ठभूमि में रथ यात्रा पर रोक लगा दी गई थी। अदालत ने कहा कि जगन्नाथ मंदिर प्रबंधन समिति और राज्य सरकार दिशानिर्देशों के अनुसार रथ यात्रा निकाल सकते हैं।

अदालत ने भक्तों की भीड़ जुटने की अनुमति दिए बिना बहुत ही प्रतिबंधित तरीके से रथ यात्रा का निर्देश दिया। ओडिशा सरकार केंद्र के साथ समन्वय के लिए सहमत है।
अदालत ने कहा, "हम इस (रथ यात्रा) को केवल कुछ शर्तों पर निकालने की अनुमति दे रहे हैं।"

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