कर्क संक्रांति पर ऐसे करेंगे पूजा तो प्रसन्न होंगे सूर्यदेव, देंगे शुभाशीर्वाद

16 Jul, 2020 03:30 IST|Sakshi
कर्क संक्रांति पूजा

16 जुलाई, गुरुवार को है कर्क संक्रांति 

सूर्यदेव मिथुन से कर्क राशि में करेंगे प्रवेश 

कर्क संक्रांति का महत्व व पूजा-विधि 

सूर्यदेव हर राशि में एक महीने तक रहते हैं और उनके राशि परिवर्तन को संक्रांति कहते हैं। जिस राशि में वे जाते हैं उसी नाम से संक्रांति का नामकरण होता है। जैसे अब 16 जुलाई, गुरुवार को सूर्यदेव मिथुन को छोड़कर कर्क राशि में प्रवेश करेंगे तो इसे कर्क संक्रांति कहते हैं। 

मकर संक्रांति के बाद कर्क संक्रांति का बड़ा महत्व है। सावन मास में सूर्य का यह राशि परिवर्तन शुभ फलदायी साबित होगा। इस दिन सूर्य दक्षिणायन हो रहे हैं। सूर्य मकर संक्रांति तक दक्षिणायन ही रहेंगे। 16 जुलाई को रात 10:36 पर रोहिणी नक्षत्र में सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करेगा और दक्षिणायन शुरू हो जाएगा।


कर्क संक्रांति का मुहूर्त 

कर्क संक्रांति का मुहूर्त महत्वपूर्ण माना गया है। पंचांग के अनुसार कर्क संक्रांति का पुण्य काल गुरुवार यानि 16 जुलाई को प्रात: 6.15 से 11 बजे तक रहेगा। मान्यता है कि पुण्यकाल में स्नान, दान और पूजा करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं।


शुभ फलदायी है इस बार की कर्क संक्रांति 

इस बार रात में सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करेगा। ज्योतिष के संहिता ग्रंथों के अनुसार रात में संक्रांति हो तो सुख देने वाली होती है। आर्थिक और व्यापार के क्षेत्र में लाभ की स्थिति बनती है। डंक ऋषि के अनुसार गुरुवार के दिन सूर्य संक्रांति होने से इसका नाम महोदरी है। इसके प्रभाव से लोगों का व्यापार बढ़ेगा और आर्थिक स्थिति भी मजबूत होंगी। पीले रंग की चीजों के दाम कम होने की भी संभावना है।

कर्क संक्रांति पर ऐसे करें पूजा 

- कर्क संक्रांति के दिन पवित्र नदी में स्नान करने का बड़ा महत्व है लेकिन कोरोना वायरस और लॉकडाउन की स्थिति में यह संभव नहीं है। ऐसे में घर पर स्नान करने से पूर्व जल में गंगाजल की बूंदें मिला लेना चाहिए।  

- कर्क संक्रांति के दिन सूर्य भगवान को अर्घ्य देने से सूर्यदेव का आर्शीवाद प्राप्त होता है। सूर्य प्रसन्न होने से पद, मान-सम्मान में वृद्धि करते हैं।

- इस दिन कामिका एकादशी भी है तो भगवान विष्णु की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम का जाप करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

- सावन का महीना चल रहा है तो भगवान शिव की पूजा भी जरूर करें। भगवान भोलेनाथ की पूजा करने से पुण्य फलों में वृद्धि होती है। इस दिन ऊं नम: शिवाय मंत्र बोलते हुए दूध और गंगाजल से शिवजी का अभिषेक करना चाहिए। इसके बाद बेलपत्र, फल और अन्य सामग्री सहित शिवलिंग का पूजन भी करना चाहिए।

-पूजा के बाद श्रद्धाअनुसार दान का संकल्प लिया जाता है। फिर जरुरतमंद लोगों को जल, अन्न, कपड़ें और अन्य चीजों का दान किया जाता है। इसके साथ ही गाय को घास खिलाने का भी महत्व है।

दक्षिणायन में नहीं होते शुभ काम

हिंदू कैलेंडर के श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष और पौष ये 6 महीने दक्षिणायन में आते हैं। इनमें से शुरुआती 4 महीने किसी भी तरह के शुभ और नए काम नहीं किए जाते। इस दौरान देव शयन होने के कारण दान, पूजन और पुण्य कर्म ही किए जाते हैं। इस समय में भगवान विष्णु के पूजन का खास महत्व होता है और यह पूजन देवउठनी एकादशी तक चलता रहता है क्योंकि विष्णु देव इन 4 महीनों के लिए क्षीर सागर में योग निद्रा में शयन करते हैं। इसके अलावा उत्तर भारत में  आश्विन कृष्णपक्ष में  पितृ पूजा करने का महत्व होता है।


 

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