Tulsi Vivah 2020: जानें इस बार कब किया जाएगा तुलसी विवाह, इसका महत्व, पूजा विधि व लाभ

25 Nov, 2020 09:26 IST|मीता
सोशल मीडिया के सौजन्य से

देवउठनी एकादशी से शुरू होते हैं मंगलकार्य

इसी दिन किया जाता है तुलसी  विवाह

इस साल इस दिन होगा तुलसी विवाह 

कार्तिक मास (Kartik Maas)  के शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुलसी विवाह (Tulsi Vivah) किया जाता है। इस वर्ष देवउठनी एकादशी (Devuthani Ekadashi 2020)  25 नवंबर बुधवार को  शुरू होकर 26 तारीख को समाप्त होगी। तो इस साल 25 या 26 नवंबर को होगा तुलसी विवाह। जो लोग एकादशी उदया तिथि को मनाते हैं वे 26 को करेंगे और जो उदया तिथि को नहीं मानते वे 25 को कर लेंगे। इस दिन तुलसी का विवाह विधिपूर्वक भगवान शालिग्राम के साथ किया जाता है।

देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह के साथ ही विवाह के मुहूर्त आरंभ होते हैं। तुलसी विवाह करना अत्यंत शुभप्रद माना जाता है और लोग धूमधाम से तुलसी विवाह संपन्न करते हैं और इस दिन दान-पुण्य का भी बड़ा महत्व है। 

यहां ऐसे कई सवाल सहज ही उठते हैं कि आखिर तुलसी विवाह क्यों होता है, शालिग्राम से ही तुलसी का विवाह क्यों होता है, इसका क्या महत्व है और इससे क्या लाभ होते हैं।

तो आइये यहां इन सारे सवालों के जवाब ढूंढते हैं ...

ये है तुलसी विवाह का महत्व

कार्तिक शुक्ल एकादशी को देवउठनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु योग निद्रा से बाहर आते हैं। उनके साथ सभी देवता भी योग निद्रा का त्याग कर देते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा होती है।

फिर भगवान शालिग्राम और तुलसी का विवाह कराया जाता है। इस दिन से ही विवाह, मुंडन, उपनयन संस्कार जैसे मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं। इस दिन का विशेष महत्व है इसीलिए इस दिन तुलसी विवाह कराया जाता है।

तुलसी विवाह से होते हैं ये लाभ

माना जाता है कि एकादशी के दिन तुलसी और भगवान शालिग्राम की विधिपूर्वक पूजा कराने से वैवाहिक जीवन में आ रही समस्याओं का अंत हो जाता है। जिन लोगों का विवाह नहीं हो रहा है, उन लोगों के रिश्ते पक्के हो जाते हैं। इतना ही नहीं, तुलसी विवाह कराने से कन्यादान जैसा पुण्य भी प्राप्त होता है।

इसी दिन से शुरू होता है पंचभीका व्रत

कार्तिक पंचतीर्थ महास्नान भी इसी दिन से शुरू होकर कार्तिक पूर्णिमा तक चलता है। पूरे महीने कार्तिक स्नान करने वालों के लिए एकादशी तिथि से 'पंचभीका व्रत' का प्रारम्भ होता है,जो पांच दिन तक निराहार रहकर किया जाता है। यह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति के लिए किया जाता है।

पदम् पुराण में वर्णित एकादशी महात्यम के अनुसार देवोत्थान एकादशी व्रत का फल एक हज़ार अश्वमेघ यज्ञ और सौ राजसूय यज्ञ के बराबर होता है।

एकादशी तिथि का उपवास बुद्धिमान,शांति प्रदाता व संततिदायक है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान व भगवान विष्णु के पूजन का विशेष महत्त्व है। इस व्रत को करने से जन्म-जन्मांतर के पाप क्षीण हो जाते हैं तथा जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है।

ऐसे कराया जाता है तुलसी-शालिग्राम का विवाह

इस दिन सांयकाल में पूजा स्थल को साफ़-सुथरा कर लें, चूना व गेरू से श्री हरि के जागरण के स्वागत में रंगोली बनाएं। घी के ग्यारह दीपक देवताओं के निमित्त जलाएं। द्राक्ष, ईख, अनार, केला, सिंघाड़ा, लड्डू, पतासे, मूली आदि ऋतुफल एवं नवीन धान्य इत्यादि पूजा सामग्री के साथ रखें। यह सब श्रद्धापूर्वक श्री हरि को अर्पण करने से उनकी कृपा सदैव बनी रहती है।

एकादशी की शाम को तुलसी के पौधे के गमले को गेरु आदि से सजाते हैं। फिर उसके चारों ओर ईख का मण्डप बनाकर उसके ऊपर ओढ़नी या सुहाग की प्रतीक चुनरी ओढ़ाते हैं। गमले को साड़ी में लपेटकर तुलसी को चूड़ी पहनाकर उनका श्रृंगार करते हैं।

इसके बाद भगवान गणेश आदि देवताओं का तथा शालिग्राम जी का विधिवत पूजन करके श्रीतुलसी जी की षोडशोपचार पूजा 'तुलस्यै नमः' मंत्र से करते हैं। इसके बाद एक नारियल दक्षिणा के साथ टीका के रूप में रखते हैं तथा भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसी जी की सात परिक्रमा कराएं और आरती के पश्चात विवाहोत्सव पूर्ण करें।

तुलसी विवाह में हिन्दू विवाह के समान ही सभी कार्य संपन्न होते हैं। विवाह के समय मंगल गीत भी गाए जाते हैं। राजस्थान में तुलसी विवाह को 'बटुआ फिराना' कहते हैं। श्रीहरि विष्णु को एक लाख तुलसी पत्र समर्पित करने से वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति होती है।

तुलसी विवाह में कई गीत, भजन व तुलसी नामाष्टक सहित विष्णुसहस्त्रनाम के पाठ किए जाने का विधान है। शास्त्रों के अनुसार तुलसी-शालिग्राम विवाह कराने से पुण्य की प्राप्ति होती है, दांपत्य जीवन में प्रेम बना रहता है।

कार्तिक मास में तुलसी रुपी दान से बढ़कर कोई दान नहीं हैं। पृथ्वी लोक में देवी तुलसी आठ नामों वृंदावनी, वृंदा, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, पुष्पसारा, नंदिनी, कृष्णजीवनी और तुलसी नाम से प्रसिद्ध हुईं हैं। श्री हरि के भोग में तुलसी दल का होना अनिवार्य है, भगवान की माला और चरणों में तुलसी चढ़ाई जाती है।

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2020 में तुलसी विवाह का शुभ मुहूर्त:


एकादशी तिथि प्रारंभ – 25 नवंबर, सुबह 2:42 बजे से
एकादशी तिथि समाप्त – 26 नवंबर, सुबह 5:10 बजे तक
द्वादशी तिथि प्रारंभ – 26 नवंबर, सुबह 05 बजकर 10 मिनट से
द्वादशी तिथि समाप्त – 27 नवंबर, सुबह 07 बजकर 46 मिनट तक


 

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