जिस वृंदा ने भगवान विष्णु को दिया था श्राप, जानें फिर क्यों शालिग्राम स्वरूप से होता है उसका विवाह

21 Nov, 2020 07:43 IST|मीता
सोशल मीडिया के सौजन्य से

देवउठनी एकादशी को होता है तुलसी विवाह

तुलसी विवाह से ही शुरू होते हैं मंगल कार्य 

देवउठनी एकादशी (Devuthani ekadashi) आने ही वाली है और हम सब जानते ही हैं कि इस दिन तुलसी और शालीग्राम का धूमधाम से विवाह कराया जाता है और चतुर्मास के बाद इसी दिन से विवाह आदि मंगल कार्य शुरू हो जाते हैं। 

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवउठनी एकादशी कहते हैं और इसका बड़ा महत्व है क्योंकि इसी दिन भगवान विष्णु (Lord Vishnu) चतुर्मास के बाद जागते हैं और इसी दिन से सारे शुभ कार्य आरंभ होते हैं। इस बार देवउठनी एकादशी 25 नवंबर को है। कहा जाता है कि विष्णु जी जागने के पश्चात सबसे पहले तुलसी की प्रार्थना सुनते हैं। इस दिन तुलसी और विष्णु जी के विग्रह स्वरूप शालीग्राम का विवाह किया जाता है।

सभी तुलसी विवाह (Tulasi Vivah)  कराते हैं पर उससे पहले यह जानना चाहिए कि तुलसी कौन है और क्यों उनका विवाह भगवान शालिग्राम से कराया जाता है साथ ही विष्णु को कैसे मिला शालिग्राम का स्वरूप।

तो आइये यहां जानते हैं इससे जुड़ी पौराणिक कथा जो इन सारे सवालों के जवाब देती है ....

तो इसलिए होता है तुलसी का शालिग्राम से विवाह

नारद पुराण के अनुसार प्राचीनकाल में दैत्यराज जलंधर का तीनों लोक में अत्याचार बढ़ गया था। उसके अत्याचार से ऋषि-मुनि, देवता गण और मनुष्य बेहद परेशान और दुखी थे। जलंधर बड़ा ही वीर और पराक्रमी था, इसका सबसे बड़ा कारण था उसकी पत्नी वृंदा का पतिव्रता धर्म। इस कारण से वह पराजित नहीं होता था।

एक बार देवता उसके अत्याचारों से त्रस्त होकर भगवान विष्णु की शरण में रक्षा के लिए गए। तब भगवान विष्णु ने वृंदा का पतिव्रता धर्म भंग करने का उपाय सोचा। उन्होंने माया से जलंधर का रूप धारण कर लिया और वृंदा को स्पर्श कर दिया। वृंदा का पतिव्रता धर्म भंग होते ही जलंधर देवताओं के साथ युद्ध में मारा गया।

जब वृंदा को भगवान विष्णु के छल करने की बात पता चला तो उसने क्रोधवश श्रीहरि को श्राप दिया कि जिस तरह से आपने छल से पति वियोग दिया है, ठीक वैसे ही आपकी पत्नी का छलपूर्वक हरण होगा और आपको पत्नी वियोग सहने के लिए पृथ्वी लोक में जन्म लेना होगा।

यह श्राप देकर वृंदा अपने पति के साथ सती हो गई। वृंदा जहां पर सती हुई थी, वहां पर तुलसी का पौधा उग आया था।

वहीं, एक अन्य कथा में वृंदा के दूसरे श्राप का उल्लेख मिलता है। वृंदा ने भगवान विष्णु को श्राप दिया था कि जिस तरह तुमने पतिव्रता धर्म तोड़ा है, वैसे ही तुम पत्थर (शालिग्राम) के हो जाओगे। वृंदा के पतिव्रता धर्म को तोड़कर भगवान विष्णु को बहुत आत्मग्लानि हुई। उन्होंने कहा कि वे वृंदा के पतिव्रता धर्म का सम्मान करते हैं, इसलिए वृंदा तुलसी स्वरूप में उनके साथ रहेगी। वृंदा का मान रखते हुए सभी देवो ने उनका विवाह पत्थर स्वरुप विष्णु जी से करवा दिया। 

उन्होंने वृंदा को वरदान दिया कि कार्तिक शुक्ल एकादशी को जो भी उनका विवाह तुलसी के साथ कराएगा, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी। 

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भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का बड़ा महत्व है, इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। शालिग्राम और तुलसी का विवाह कराने से व्यक्ति को परम धाम वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है।


 

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