क्यों मनाई जाती है देव दीपावली, जानिए इससे जुड़ी पौराणिक कथा

27 Nov, 2020 11:43 IST|अनूप कुमार मिश्रा
गंगा आरती करते पंडित (फाइल फोटो)

30 नवंबर को मनाई जाएगी देव दीपावली

कार्तिक मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है यह पर्व

देव दीपावली के दिन काशी में गंगा घाट पर जलाए जाते हैं दीये

हिंदू धर्म में देव दीपावली (Dev Deepawali) का काफी महत्व है। कार्तिक मास की पूर्णिमा को पड़ने वाले इस पर्व का वर्णन पुराणों में मिलता है। इस बार देव दीपावली 30 नवंबर को मनाई जाएगी। इसी तिथि पर भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार हुआ था। इसके अलावा देव दीपावली का पर्व भगवान शिव की आराधना से भी जुड़ा माना जाता है। काशी (Varanasi) में इस दिन गंगा के घाटों को दीपों से सजाया जाता है। 

देव दीपावली के दिन भगवान शंकर की पूजा का विधान है। वहीं इस दिन स्नान-दान का भी विशेष महत्व है। कार्तिक पूर्णिमा को डुबकी पूनम भी कहते हैं और इस दिन खासतौर पर गंगा स्नान से पुण्य फल मिलने की बात कही जाती है।

जहां एक ओर कार्तिक पूर्णिमा को स्नान-दान का महत्व है और भक्तजन गंगा स्नान के लिए काशी पहुंचते हैं वहीं दूसरी ओर काशी में इस दिन धूमधाम से देव दीपावली मनाई जाती है। इस तरह देखा जाए तो कार्तिक पूर्णिमा का महत्व और बढ़ जाता है।

देव दीपावली के दिन गंगा पूजा के साथ भगवान शिव की आराधना करने का विधान है, जिससे लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। देव दीपावली के दिन काशी में गंगा के सभी घाटों पर दीपक जलाए जाते हैं। पूरी काशी दीयों की रोशनी से इस दिन जगमगा जाती है।

यहां सवाल उठता है कि आखिर देव दीपावली क्यों मनाई जाती है और काशी में इसका इतना महत्व क्यों है। आइये यहां जानते हैं कि क्यों मनाई जाती है देव दीपावली, क्या है इससे जुड़ी पौराणिक कथा ...

ये है देव दीपावली की कथा

भगवान शिव के ज्येष्ठ पुत्र और देवताओं के सेनापति भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया था। इसके बाद उसके तीनों बेटे तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली ने देवताओं से बदला लेने के लिए ब्रह्म देव को अपने कठोर तप से प्रसन्न किया और अमरत्व का वरदान मांगा।

ब्रह्मा जी ने कहा कि वे अमरता का वरदान नहीं दे सकते हैं, कुछ और मांगो। इन तीनों भाइयों को त्रिपुरासुर के नाम से जाना जाता है। त्रिपुरासुर ने कहा कि हमारे लिए निर्मित तीन पुरियां जब अभिजीत नक्षत्र में एक पंक्ति में हों और कोई क्रोधजित अत्यंत शांत होकर असंभव रथ पर सवार असंभव बाण से मारना चाहे, तब ही हमारी मृत्यु हो। ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह दिया।

ब्रह्मा जी से वरदान पाकर त्रिपुरासुर देवताओं, ऋषि-मुनियों, मनुष्यों पर अत्याचार करने लगे। सभी देवता मिलकर भी उनको हरा नहीं पा रहे थे। त्रिपुरासुर ने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर आधिपत्य कर लिया। सभी देवता भगवान शिव की शरण में पहुंचे। महादेव ने उनसे कहा कि तुम सब मिलकर उससे युद्ध करो।

तब देवताओं ने कहा कि हम ऐसा कर चुके हैं। तब भगवान शिव ने कहा कि उनका आधा बल ले लो और जाकर उनसे लड़ो। लेकिन सभी देवता भगवान शिव के बल को संभाल नहीं पाए, तब उन्होंने स्वयं त्रिपुरासुर के वध का संकल्प लिया। इसके बाद सभी देवताओं ने महादेव को अपना आधा बल दे दिया। फिर भगवान शिव ने धरती को असंभव रथ बनाया, जिसमें सूर्य और चंद्रमा उसके दो पहिए बने।

भगवान विष्णु बाण, वासुकी धनुष की डोर और मेरूपर्वत धनुष बने, ऐसे तैयार हुआ असंभव धनुष और बाण। फिर भगवान शिव उस असंभव रथ पर सवार होकर असंभव धनुष पर बाण चढ़ा लिया और अभिजीत नक्षत्र में तीनों पुरियों के एक पंक्ति में आते ही प्रहार कर दिया।

प्रहार होते ही तीनों पुरियां जलकर भस्म हो गईं और त्रिपुरासुर का अंत हो गया। उस दिन कार्तिक पूर्णिमा थीं। त्रिपुरासुर का अंत होने पर सभी देवी देवता बहुत प्रसन्न हो गए। वे सभी भगवान शिव की नगरी काशी पहुंचे। फिर उन सभी ने गंगा पूजन के साथ दीप दान किया। यही वजह है कि कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाने लगा। इसके बाद से ही हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली मनाई जाने लगी। इस दिन काशी के घाट दीयों की रोशनी से जगमगा जाते हैं और यह दृश्य देखने लायक होता है।

Load Comments
Hide Comments
More News
आंध्र-प्रदेश
मुख्य समाचार
.