भगवान दादा : 'सिग्नेचर डांस' के लिए गणपति बप्पा भी करते थे इंतजार, अमिताभ बच्चन ने भी किया कॉपी

31 Jul, 2020 13:26 IST|Sakshi
अभिनेता भगवान दादा (फोटो सौजन्य सोशल मीडिया)

महान अभिनेता थे भगवान दादा

'सिग्नेचर डांस' ने बदल दी थी जिंदगी

जन्मदिन विशेष : भगवान दादा हिन्दी सिनेमा की एक ऐसी शख्सियत रहें थे, जिनकी जिंदगी की कहानी जहां लोगों को प्रेरणा देती है, तो वही हैरान करने वाली भी है। इन्हें  शोहरत चमत्कार की तरह मिली थी, और रूठी भी कुछ इस तरह की अर्श से फर्श तक पहुंचा दिया था। लेकिन इन्होंने कभी हार नहीं मानी, फिल्मों में जिस तरह अपनी हास्य भूमिकाओं के जरिए हंसाते रहे, असल जिंदगी में भी इन्होंने जिंदगी के प्रति अपनी सकारात्मकता बनाए रखी। आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी खास बातें।

मजदूर परिवार में हुआ जन्म 

साल 1913 में जब दादा साहब फाल्के राजा 'हरिश्चंद्र' के जरिए देश में हिन्दी सिनेमा की नींव रख रहे थे, मुंबई में दादर की एक चॉल में एक मजदूर परिवार में किलकारी गूंजी थी। उस मजदूर परिवार ने बच्चे का नाम भगवान आभाजी पालव रखा था। भारतीय सिनेमा के जन्म के साथ उनकी पैदाइश एक अनोखा संयोग रहा है। मजदूर परिवार में जन्मे भगवान दादा ने फिल्मों में अपनी पहचान बनाई। मजदूर परिवार में जन्म लेने के चलते इन्होने पांचवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी, और पिता के साथ कपड़ा मिल में काम करने लगे। लेकिन इनके मन में फिल्मों में करने की इच्छा प्रबल होती जा रही थी।

पहली फिल्म में ही किया था जबरदस्त अभिनय 

भगवान दादा  को कुश्ती का बहुत शौक था, यही वजह रही कि इनके नाम के आगे दादा जुड़ गया और वे भगवान दादा हो गए। उन्होंने मूक फिल्मों के दौर में फिल्मों में कदम रखा था ‘क्रिमिनल’ उनकी पहली फिल्म थी। बताते हैं कि वे इतने मजे हुए कलाकार थे कि पहली फिल्म में उन्होंने जब कुबड़े की भूमिका निभाई तो अगले छह महीने तक उन्हे फिल्मों में काम ही नहीं मिला। फिल्म निर्माताओं को लगता था कि वो वास्तव में कुबड़े हैं। 

'अलबेला' फिल्म से मिली शोहरत

भगवान दादा अपनी 'अलबेला' जैसी फिल्म के लिए खास तौर पर जाने जाते हैं। इस फिल्म में किया गये उनके डांस को खासी लोकप्रियता मिली।

फिल्म 'अलबेला' ने भगवान दादा को खूब शोहरत दिलवाई थी। 'भोली सूरत दिल के खोटे' और 'शोला जो भड़के' फिल्मों  में इनके डांस को महानायक अमिताभ बच्चन, गोविंदा, मिथुन जैसे अभिनेता फॉलो करते रहे हैं। फिल्म 'अलबेला' ने भगवान दादा की जिंदगी को बदल दिया। दादर की पुरानी चाल से निकल कर वो जुहू बीच के बड़े बंग्ले में पहुंच गए। ये वो वक्त  था जब उनके घर के सामने लग्जरी गाड़ियां खड़ी रहती थीं । 

भगवान दादा ने फिल्मों में अभिनय के अलावा छोटे बजट की कई फिल्में बनाई थीं। दादा हिंदी सिनेमा में अपने एक्शन खुद करने वाले शुरुआती लोगों में से एक थे।1949 तक वो लो बजट स्टंट फिल्में बनाते रहे। उस दौर के मजदूर तबके में ये फिल्में खूब लोकप्रिय होती थीं। 

 सफलता की बुलंदियों तक पहुंचने के बाद किस्मत भगवान दादा से रूठ गई, वो फिर से अर्श से फर्श पर पहुंच गए। 'अलबेला' के बाद उनकी  ‘लाबेला’ और ‘झमेला’ नहीं चल पाईं । 'सहमे हुए सपने' बॉक्स ऑफिस पर पिट गयी। इसके बाद उनकी फिल्म 'हंसते रहना ' उनके जीवन की सबस सबसे बड़ी गलती साबित हुई। फिल्म पूरी नहीं हो पाई और देखते-देखते बंग्ला, गाड़ी, गहने सब कुछ बिक गया। रही सही कसर फिल्मों के गोदाम में लगी आग ने पूरी कर दी। उनकी सारी फिल्मे जल कर खाक हो गई। केवल फिल्म अलबेला बच पायी जिसे उन्होंन गिरवी रखा था। 

अर्श से फर्श तक वापस पहुंचने के बाद  भगवान दादा अपनी पुरानी चाल में फिर से वापस पहुंच गए। दादर की चाल के लोगों ने फिर से उन्हें अपना लिया, लोगों के दिल में उनके लिए सम्मान हमेशा बना रहा और उनके सिग्नेचर डांस का सिलसिला जारी रहा। प्रत्येक साल होने वाले गणपति विसर्जन के दौरान लोग इनकी चाल के सामने आकर रुकते थे, भगवान दादा बाहर आकर सिग्नेचर डांस करते थे, उसके बाद ही विसर्जन आगे बढ़ता था। 
 

Load Comments
Hide Comments
More News
आंध्र-प्रदेश
मुख्य समाचार
.