तो इसलिए खास होता है शनि प्रदोष व्रत, इसका महत्व व पौराणिक कथा

1 Aug, 2020 03:10 IST|मीता
शनि प्रदोष कथा

शनि प्रदोष व्रत का महत्व

शनि प्रदोष व्रत कथा 

प्रदोष व्रत का बड़ा महत्व है और माना जाता है कि यह व्रत रखने से शिव-शंकर बेहद प्रसन्न होते हैं और मनचाहा वरदान देते हैं। हर महीने में दो बार प्रदोष व्रत रखा जाता है, एक कृष्णपक्ष में तो दूसरा शुक्लपक्ष में। यह व्रत द्वादशी/त्रयोदशी तिथि के दिन रखा जाता है। 

माना जाता है कि अगर किसी भी जातक को भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करना हो तो उसे प्रदोष व्रत अवश्य करना चाहिए। इस व्रत को करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं तथा व्रती को सभी सांसारिक सुखों की प्राप्ति करवाने के साथ-साथ पुत्र प्राप्ति का वर भी देते हैं। इसके साथ ही अगर किसी खास दिन यह व्रत आता है तो उस दिन से संबंधित देवता का पूजन करना अतिलाभदायी माना गया है।

सावन माह का दूसरा व अंतिम शनि प्रदोष व्रत 1 अगस्त को है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान शनिदेव को मनाने के ऐसे कई उपाय हैं जिनके द्वारा शनि की शांति होती है इसमें शनि प्रदोष के दिन का अधिक महत्व है।

माना जाता है कि शनि प्रदोष व्रत के दिन कोई जातक पूरी श्रद्धा व मन से शनि देव की उपासना करें तो उसके सभी कष्‍ट और परेशानियां निश्चित ही दूर होते हैं तथा शनि का प्रकोप, शनि की साढ़ेसाती या ढैया का प्रभाव भी कम हो जाता है, इसका अनुभव जातक स्वयं लेकर फिर दूसरे किसी अन्य पीड़ित के कष्ट को दूर कर सकता है।

शनि को मनाने के लिए शनि प्रदोष व्रत बहुत फलदायी है। यह व्रत करने वाले पर शनिदेव की असीम कृपा होती है। शनि प्रदोष व्रत शनि के अशुभ प्रभाव से बचाव के लिए उत्तम होता है। यह व्रत करने वाले को शनि प्रदोष के दिन प्रात:काल में भगवान शिवशंकर की पूजा-अर्चना करनी चाहिए, तत्पश्चात शनिदेव का पूजन करना चाहिए।

इस दिन शनि चालीसा, शनैश्चरस्तवराज:, शिव चालीसा का पाठ तथा आरती भी करनी चाहिए।इस व्रत में प्रदोष काल में आरती एवं पूजा होती है। संध्या के समय जब सूर्य अस्त हो रहा होता है एवं रात्रि का आगमन हो रहा होता है उस प्रहार को प्रदोष काल कहा जाता है।

ऐसा माना जाता है की प्रदोष काल में शिव जी साक्षात शिवलिंग पर अवतरित होते हैं और इसीलिए इस समं शिव का स्मरण करके उनका पूजन किया जाए तो उत्तम फल मिलता है। इसके साथ ही शनि प्रदोष होने के कारण शनि देव का पूजन करना अवश्य ही लाभदायी रहता है।

ये है शनि प्रदोष व्रत की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय प्राचीन काल में एक नगर में एक सेठ थे। वह काफी धनवान थे लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। इस वजह से वे और उनकी पत्नी काफी दुखी थे। संतान की कामना से उन्होंने पत्नी के साथ तीर्थयात्रा पर जाने का निर्णय लिया। एक दिन उन्होंने अपना सारा कामकाज अपने नौकरों को सौंप दिया और पत्नी के साथ तीर्थ यात्रा पर निकल गए। 

थोड़े समय तक यात्रा करने के बाद वे अपने नगर के दूसरे छोर पर पहुंच गए। उन्होंने वहां पर एक साधु को ध्यानमग्न होकर बैठे देखा। तब उन्होंने सोचा कि आगे बढ़ने से पहले एक बार साधू से मिल लें और उनका आशीर्वाद ले लें। वे अपनी पत्नी के साथ साधु के समक्ष बैठ गए। कुछ समय बाद साधू का ध्यान टूटा तो उनके सामने सेठ और सेठानी बैठे थे।

साधु ने उन दोनों को देखा और मुस्कुराया। उन्होंने उन दोनों से कहा कि वे उनका दुख जानते हैं। साधु ने कहा कि तुम दोनों जिस संतान की कामना कर रहे हो, उसकी प्राप्ति के लिए तुमको शनि प्रदोष का व्रत करना चाहिए। निश्चित ही तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी। सेठ अपनी पत्नी के साथ उस साधु का आशीर्वाद लेकर तीर्थ यात्रा पर निकल गए।

तीर्थयात्रा से लौटने के बाद सेठ और सेठानी ने साधु के बताए अनुसार शनि प्रदोष व्रत किया और विधि विधान से भगवान शिव की आराधना की, जिससे उनकी मनोकामना पूर्ण हुई। ​कुछ समय बाद उनके घर एक बालक का जन्म हुआ।

संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले लोग शनि प्रदोष व्रत रखते हैं। हालांकि इसके अतिरिक्त भी लोग शनि प्रदोष का व्रत रखते हैं और व्रत ​कथा का पाठ करते हैं।

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