शुक्रवार विशेष : ऐसे हुई मां लक्ष्मी की उत्पत्ति, ये है इससे जुड़ी पौराणिक कथा

26 Jun, 2020 04:10 IST|Sakshi
माता लक्ष्मी की उत्पत्ति कथा

माता लक्ष्मी को समर्पित है शुक्रवार 

ऐसे हुई थी मां लक्ष्मी की उत्पत्ति

ऐसे विष्णु की अर्धांगिनी बनी 

हिंदू धर्म में लक्ष्मी पूजा का बड़ा महत्व है और माना जाता है कि मां लक्ष्मी की पूजा करने से सारे संकट दूर हो जाते हैं और भक्त को सुख-संपत्ति का वरदान मिलता है। वैसे तो हर दिन लक्ष्मी पूजा की जाती है पर शुक्रवार का दिन तो देवी मां लक्ष्मी को ही समर्पित होता है। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा-उपासना विशेष रूप से की जाती है। 

मां लक्ष्मी को धन की देवी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि मां इतनी चंचल है कि वह किसी एक जगह पर अधिक समय तक नहीं रुकती है। ऐसे में मां की कृपा पाने के लिए व्यक्ति को निरंतर इनकी पूजा-उपासना करनी चाहिए। मां लक्ष्मी, भगवान विष्णु की अर्धांग्नी हैं और क्षीर सागर में उनके साथ रहती है। 

आइए यहां जानते हैं कि मां लक्ष्मी की उत्पत्ति कैसे हुई .....

ये है इससे जुड़ी कथा

विष्णु पुराण के अनुसार, चिरकाल में एक बार ऋषि दुर्वासा ने स्वर्ग के देवता राजा इंद्र को सम्मान में फूलों की माला दी, जिसे राजा इंद्र ने अपने हाथी के सिर पर रख दिया। हाथी ने फूलों की माला को पृथ्वी पर फेंक दिया। यह देख ऋषि दुर्वासा क्रोधित हो उठे और उन्होंने इंद्र को श्राप दिया कि आपके इस अहंकार की वजह से आपका पुरुषार्थ क्षीण हो जाएगा और आपका राज-पाट छिन जाएगा।

इसके बाद कालांतर में दानवों का आतंक इतना बढ़ गया कि तीनों लोकों पर दानवों का आधिपत्य हो गया। इस वजह से राजा इंद्र का सिंहासन भी छिन गया। तब देवतागण भगवान विष्णु की शरण में जा पहुंचे। भगवान ने देवताओं को समुद्र मंथन की सलाह देते हुए कहा कि इससे आपको अमृत की प्राप्ति होगी, जिसका पान करने से आप अमर हो जाएंगे। इस अमरत्व की वजह से आप दानवों को युद्ध में परास्त करने में सफल होंगे।

भगवान के वचनानुसार, देवताओं ने दानवों के साथ मिलकर क्षीर सागर में समुद्र मंथन किया, जिससे 14 रत्न सहित अमृत और विष की प्राप्ति हुई। इस समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी की भी उत्पत्ति हुई, जिसे भगवान विष्णु ने अर्धांगिनी रूप में धारण किया।

जबकि देवताओं को अमृत की प्राप्ति हुई, जिसका पान कर देवतागण अमर हो गये। कालांतर में देवताओं ने दानवों को महासंग्राम में परास्त कर अपना राज पाट प्राप्त किया। इस अमरत्व से राजा इंद्र ऋषि दुर्वासा के श्राप से भी मुक्त हो गये ।

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