अधिक मास में करें इन नियमों का पालन, भूल से भी न करें ये गलतियां

17 Sep, 2020 22:54 IST|मीता
अधिक मास के नियम

18 सितंबर से शुरू हो रहा है अधिक मास

अधिक मास में करें इन नियमों का पालन 

भूलकर भी न करें ये गलतियां 

हिंदू कैलेंडर में हर तीन साल में एक बार एक अतिरिक्त माह का प्राकट्य होता है जिसे अधिक मास, मल मास या पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म में इस माह का विशेष महत्व है। तो इस बार पितृपक्ष के तुरंत बाद नवरात्रि शुरू नहीं होगी बल्कि अधिक मास शुरू हो जाएगा। इसके एक महीने बाद आएगी नवरात्रि।

माना जाता है कि अधिक मास में किए गए धार्मिक कार्यों का किसी भी अन्य माह में किए गए पूजा-पाठ से 10 गुना अधिक फल मिलता है। यही वजह है कि श्रद्धालु अपनी पूरी श्रद्धा और शक्ति के साथ इस मास में भगवान को प्रसन्न कर अपना इहलोक तथा परलोक सुधारने में जुट जाते हैं। 

आश्विन अधिक मास 18 सितंबर से शुरू हो रहा है जो 16 अक्टूबर को समाप्त होगा। अधिक मास में मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। 
ब्रह्मसिद्दांत के अनुसार- 


'यस्मिन मासे न संक्रान्ति, संक्रान्ति द्वयमेव वा। मलमासः स विज्ञेयो मासे त्रिंशत्त्मे भवेत।।
अर्थात जिस चन्द्रमास में संक्रांति न पड़ती हो उसे मलमास या पुरुषोत्तम मास कहते हैं। 

शास्त्रों में अधिक मास के कुछ खास नियम बताए गए हैं जिनका पालन करना बेहद जरूरी है। 

आइये जानते हैं क्या है अधिक मास के नियम ....

अधिक मास में नहीं किये जाते ये कार्य 

इस महीने शादी, सगाई, झडुला, गृह निर्माण आरम्भ, गृहप्रवेश, मुंडन, संन्यास अथवा शिष्य दीक्षा लेना, नववधू का प्रवेश, देवी-देवता की प्राण-प्रतिष्ठा, यज्ञ, बड़ी पूजा-पाठ का शुभारंभ, बरसी(श्राद्ध), कूप, बोरवेल, जलाशय खोदने जैसे पवित्र कार्य नहीं किए जाते हैं। 
वहीं अधिक मास में रोग निवृत्ति के अनुष्ठान, ऋण चुकाने का कार्य, शल्य क्रिया, संतान के जन्म संबंधी कर्म, सूरज जलवा आदि किए जा सकते हैं। इस माह में व्रत, दान, जप करने का अवश्य फल प्राप्त होता है।

इस साल बना है ये खास संयोग


इस बार अधिक मास में ऐसा शुभ संयोग बन रहा है जो 160 साल पहले बना था। फिर 2039 में भी ऐसा संयोग बनेगा। इस साल संयोग ये है कि लीप ईयर और आश्विन अधिक मास दोनों एक साथ आएं हैं। ऐसा संयोग 160 साल पहले 1860 में बना था। 

भगवान शालिग्राम की इस विधि से करें पूजा


अधिक मास में शुभ फल पाने के लिए भगवान शालिग्राम की पूजा विधि अनुसार की जाती है। अधिक मास के पहले दिन प्रातः काल नित्य नियम से निवृत हो श्वेत या पीले वस्त्र धारण कर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके किसी ताम्र पात्र में पुष्प बिछाकर शालिग्राम स्थापित करें। फिर शुद्धजल में गंगाजल मिलाकर, श्री विष्णुजी का ध्यान करते हुए स्नान कराएं। 

इन चीजों को करें अर्पित


इसके बाद शालिग्राम विग्रह पर चन्दन लगाकर तुलसी पत्र, सुगन्धित पुष्प, नैवेद्य, फल आदि अर्पित करें। अब 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करने के उपरान्त कपूर से आरती करें। अभिषेक के जल को स्वयं एवं परिवार के सदस्यों को ग्रहण कराएं। इसी के साथ श्रीमदभागवत कथा, गीता का पाठ, श्री विष्णु सहस्त्र्नाम का पाठ पुरुषोत्तम मास में करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।


 

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